श्मशान घाट पर लकड़ी की कमी को पूरा करने गन्ने के बगास का सहारा

सूरत में कोरोना महामारी गंभीर स्वरूप धारण कर चुकी है। अब शहर के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना के मामले बढ़ रहे है। रोजाना 25 से ज्यादा लोगों की कोरोना से मौत हो रही है। इस आपदा की घड़ी में अब श्मशान भी कम पडऩे लगे है। श्मशान घाटों पर अग्निदाह के लिए कतार लग रही है। इस स्थिति से निपटने उमरा में श्मशान घाट के पीछे कामचलाउ भट्टी बनाकर अग्निदाह किया जा रहा है। इतना ही नहीं पाल क्षेत्र में तो पिछले 14 वर्षो से बंद पड़े श्मशान घाट को भी शुरू करने की नौबत आयी है। हर दिन बड़े पैमाने पर मृतदेहों का अग्निदाह किए जाने से अब श्मशान घाटों पर लकड़ी की कमी महसूस हो रही है। अब श्मशान घाटों पर लकड़ी की कमी को पूरा करने के लिए गन्ने के बगास का सहारा लिया जा रहा है।

मृतदेह का अंतिम संस्का करते समय बगास को लकडिय़ों के बीच फैला दिया जाता है। जिससे की गीली लकडिय़ा भी जल्द ही जलने लगती है। ग्रामीण क्षेत्र ओलपाड सहित कई जगहों पर बगास का सहारा लिया जा रहा है। गन्ने की बगास चीनी बनाते समय बाय प्रोडक्ट के तौरपर मिलती है। जिसकी बाजार कीमत 900 रूपए टन है, लेकिन कोरोना महामारी में शुगर फैक्ट्रियों द्वारा इसे निशुल्क दिया जा रहा है। इससे श्मशान घाटों पर लकड़ी की कमी को पूरा किया जाएगा।

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