पूजा अर्चना का महत्वपूर्ण दिन वैशाख पूर्णिमा

कांतिलाल मांडोत
आज का दिन महत्वपूर्ण है।वैशाख पूर्णिमा का दिन अत्यंत महिमापूर्ण दिन है। समृद्धि की वृद्धि के लिए माता लक्ष्मी की पूजा आराधना के लिए खास दिन है। वैशाख पूर्णिमा पर आज ही के दिन लोग दान पुण्य का उपार्जन करते है। धन्य धान की वृद्धि के लिए आज विशेष पूजाकी जाती है। बारह महीने में आने वाली पूर्णिमा का इतना प्रभाव नही है,जिसका महत्व वैशाख और कार्तिक पूर्णिमा का है।कार्तिक पूर्णिमा पर जैन साधुओं द्वारा चार महीने तक एक ही जगह पर रहने के बाद चातुर्मास समाप्ति का दिन होता है। इसलिए कार्तिक पूर्णिमा का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन महान आत्माओं का जन्म दिवस होने के साथ ही समाज के लिए प्रेरणा देने वाला दिन है। भगवान विष्णु का अवतार माने जाने वाले भगवान बुद्ब का जन्म आज ही के दिन हुआ है। आज बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है। आज चन्द्र पूजन के साथ भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा कर घर मे सुख समृद्धि की वृद्धि की कामना करते है।माता कुलदेवी की आराधना के लिए वैशाख पूर्णिमा का महत्व बहुत अधिक है।

आज मंदिरों में आराधना की जाती है। कोरोना वायरस की वजह से लोग घरों में ही पूजा पाठ कर अपने इष्ट देव को लापसी या कंसार का भोग लगाते है।आज के दिन माता के समक्ष सात्विक चीजो का भोग लगाए।अपने भगवान की पूजा अर्चना से ही दु:ख दूर होते है। पूजा आराधना से ही व्याधि का क्षय दूर होता है। आराधना से सिद्धि प्राप्त होती है। इसलिए लक्ष्मी की पुण्य प्राप्ति के लिए सुख के लिए आराधक बनना चाहिए।पूजा की अचिन्त्य महिमा है।जैन परम्परा में वैशाख पूर्णिमा का बहुत बड़ा महत्व है।आज के दिन माता की आराधना की जो पावन परम्परा है,इसका आरम्भ पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है।

उदयपुर सहित ग्रामीण क्षेत्र के प्रवासियों का आवागमन पूर्णिमा के करीब 15 दिन पहले से ही हो जाता है। यू तो सभी समाज मे पूर्णिमा को विशेष तिथि के रूप में मानते है। कोरोना की महामारी की वजह से इस बार प्रवासी जैन और अजैन बंधुओं का आना नही हुआ है।हर वर्ष वैशाख और कार्तिक पूर्णिमा अपने पैतृक गांव में ही मनाना पसन्द करते है।पूर्णिमा के पहले अपने गांव आ जाते है।

आज ही के दिन वैशाख पूर्णिमा पर रतजगा कर दूसरे दिन माता को नैवेध चढ़ाते है। आज पुर्णिमा के दिन भजन कीर्तन किये जाते है।पूर्वज बावजी का फुलेरा पर लापसी का भोग लगता है। घर मे मांगलिक प्रसंग के रूप में अपनी कुलदेवी की आराधना का दिन है वैशाख पूर्णिमा। फुलेरा और कुलदेवी माता को सवामन की प्रसादी के मौके पर आज ही के दिन बहन बेटियों को बुलाया जाता है। लेकिन कालरूपी कोरोना ने सामाजिक रीति रिवाजो पर अपनी काली छाया मंडरा दी है। गाजे बाजे के साथ पूर्वज बावजी को बैठाया जाता है।

यह किसी वैवाहिक आयोजन से कम नही है।कोरोना से डूबती सांसो ने सामाजिक परम्परा को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन दुख के दिन चार ही है।फिर से समाज मे खुशी लौटेगी। लोग फिर अपने अतीत के दिनों की परंपराओं को मनाने के लिए अपने आप को मजबूत करेंगे।

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