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स्वास्थ्य और समृद्धि की खेती कर रहे सूरत के दो किसान भाई: खजूर से बनाते हैं स्वास्थ्य को निरोग रखने वाला ‘नीरा’

कामरेज के उंभेल गांव के किसान भाइयों ने फ्यूचरिस्टिक फार्मिंग के जरिए आठ बीघा में 3500 खजूर के पौधों का रोपण किया

सूरत : प्रकृति को संवारने वाली प्राकृतिक खेती अपनाकर अनेक किसानों को समृद्धि की दिशा मिली है। कृषि और ऋषि संस्कृति वाले भारत में आज प्राकृतिक खेती मिशन मोड में गति पकड़ रही है। दक्षिण गुजरात की उपजाऊ भूमि में अब किसान केवल धान या गन्ने पर निर्भर न रहकर आधुनिक और बाजारोन्मुख खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं। गुजरात सरकार द्वारा पारंपरिक खेती के साथ-साथ ‘वैल्यू एडेड’ खेती और किसानों की आय दोगुनी करने पर निरंतर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में सूरत जिले के कामरेज तालुका के उंभेल गांव के दो किसान भाइयों ने प्राकृतिक खेती में एक कदम आगे बढ़ाते हुए ‘फ्यूचरिस्टिक फार्मिंग’ अपनाई है।

राज्य सरकार की प्रोत्साहक नीतियों और नियमों के अंतर्गत उंभेल के इन प्रगतिशील किसान भाइयों ने भविष्य के बाजार की समझ के साथ खजूर की खेती की है, जिसके माध्यम से प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक पेय ‘नीरा’ के उत्पादन और बिक्री से वे अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं।

वर्षों से खेती से जुड़े किसान हेमंतभाई और राजेशभाई पटेल बताते हैं कि पहले वे पारंपरिक रूप से सब्जी, गन्ना और धान की खेती करते थे। आज से दस वर्ष पहले खेत की मेड़ पर 10 खजूर के पौधे लगाए थे। पिछले पांच वर्षों से सर्दियों में नीरा का उत्पादन शुरू होने से केवल एक ही सीजन में अच्छी आय मिली। इसलिए आने वाले दस से पंद्रह वर्षों को ध्यान में रखते हुए 8 बीघा में 3500 खजूर के पौधों का रोपण किया।

उन्होंने आगे कहा कि आज की पीढ़ी रसायनयुक्त शीतल पेयों की ओर झुक रही है, उसके मुकाबले ‘नीरा’ एक श्रेष्ठ प्राकृतिक विकल्प है। वर्तमान में प्रतिदिन 100 खजूर के पेड़ों से अनुमानित 180 से 200 लीटर नीरा प्राप्त होता है और अगले वर्ष तक प्रतिदिन 1000 से 1200 लीटर उत्पादन का लक्ष्य है। सरकार की मार्गदर्शिका के अनुसार स्वास्थ्यवर्धक नीरा का विक्रय किया जाता है। तड़के सुबह से बारडोली, नवसारी और विशेष रूप से विदेश से आने वाले एनआरआई (अनिवासी भारतीय) भी इस शुद्ध अमृत समान नीरा को पीने आते हैं।

आज के समय में जब अधिकांश युवा डिग्री लेकर 9 से 5 की नौकरी तक सीमित रहना चाहते हैं, तब हेमंतभाई पटेल के पुत्र जय पटेल ने एक नया मार्ग चुना है। जय ने नौकरी की गुलामी के बजाय अपनी धरती पर पसीना बहाकर ‘एग्री-प्रेन्योर’ (कृषि उद्यमी) बनना पसंद किया। जय पटेल का कहना है कि यदि खेती में कुशल योजना और आधुनिक पद्धतियां अपनाई जाएं, तो निश्चित रूप से सफल ‘स्टार्टअप’ विकसित किया जा सकता है। यदि गांव का युवा शिक्षित होकर खेती में अपना कौशल दिखाए, तो भारत सही अर्थों में कृषि प्रधान देश बना रहेगा—ऐसा मेरा मानना है।

उंभेल के निवासी चेतनभाई पटेल कहते हैं कि शरीर के स्वास्थ्य के लिए सर्दियों के मौसम में यह प्राकृतिक नीरा किसी आशीर्वाद से कम नहीं है। स्वास्थ्य को निरोग रखने वाला नीरा प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह तत्व, विटामिन ए, बी और सी तथा कैलोरी जैसे पोषक तत्वों से भरपूर है। खजूर से प्राप्त यह प्राकृतिक पेय ऊर्जा और स्वास्थ्य प्रदान करता है। इसमें प्रचुर मात्रा में विभिन्न खनिज होने के कारण इसे स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना जाता है। नीरा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और पाचन तंत्र के लिए भी लाभकारी है।

सूरत के इन प्रगतिशील भाइयों का यह उदाहरण सिद्ध करता है कि यदि किसान कुछ नया सोचें, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि समृद्धि का द्वार है। ‘नीरा’ जैसा शुद्ध और प्राकृतिक पेय लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ किसान की आर्थिक स्थिति को भी सुदृढ़ कर रहा है।

स्वास्थ्यवर्धक ‘नीरा’ को खजूर के वृक्ष से एकत्र करने की कुशल विधि

स्वास्थ्यवर्धक नीरा एकत्र करने के लिए सबसे पहले स्वस्थ और परिपक्व खजूर के वृक्ष का चयन किया जाता है। इसके बाद खजूर के वृक्ष के ऊपरी भाग में पत्तियों के नीचे वाले हिस्से की छाल सावधानीपूर्वक उतारकर कट लगाया जाता है और छाल साफ की जाती है। कटे हुए भाग से रस (नीरा) बह सके, इसके लिए बांस या प्लास्टिक की नली लगाई जाती है। नली के नीचे स्वच्छ छलनी लगाकर मिट्टी का मटका या साफ पात्र लटकाया जाता है, जिसमें नीरा एकत्र होता है। नीरा हमेशा तड़के सुबह सूर्योदय से पहले निकाल लेना आवश्यक है, क्योंकि सूर्यप्रकाश में उसमें किण्वन (फर्मेंटेशन) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

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