धर्म- समाज

माघी पूर्णिमा पर आस्था विज्ञान और ज्योतिष का महासंगम : कल्पवास समापन सर्वार्थ सिद्धि योग शुक्र उदय और रवि पुष्य अमृत योग का दुर्लभ संयोग

माघ मास की पूर्णिमा के साथ इस वर्ष कल्पवास का समापन ऐसे अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग में होने जा रहा है, जिसे वर्षों बाद देखा जाता है। रविवार को पड़ने वाली माघी पूर्णिमा पर एक साथ सर्वार्थ सिद्धि योग शुक्र ग्रह उदय बत्तीसी पूर्णिमा और रवि पुष्य अमृत योग का निर्माण हो रहा है। जिससे यह तिथि धार्मिक ज्योतिषीय और वैज्ञानिक तीनों दृष्टियों से अत्यंत प्रभावशाली मानी जा रही है।

ज्योतिषाचार्य गोविंद मूंदड़ा के अनुसार शास्त्रों में माघ मास को तप साधना आत्मशुद्धि और पुण्य संचय का श्रेष्ठ काल कहा गया है पद्म पुराण स्कंद पुराण और मत्स्य पुराण में उल्लेख है कि माघ माह में पृथ्वी पर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह तीव्र हो जाता है इसी कारण इस अवधि में किए गए स्नान दान जप और व्रत का फल अक्षय होता है मान्यता है कि माघ माह में समस्त देवता पृथ्वी पर वास करते हैं और माघी पूर्णिमा के दिन प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में स्नान कर अपने धाम लौटते हैं

धार्मिक दृष्टि से माघी पूर्णिमा को मोक्षदायिनी तिथि कहा गया है गंगा यमुना नर्मदा शिप्रा गोदावरी और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से जन्म जन्मांतर के पापों का नाश होता है और पितृ दोष ग्रह बाधा तथा मानसिक क्लेश से मुक्ति मिलती है बत्तीसी पूर्णिमा के योग में किया गया दान पुण्य सामान्य दिनों की तुलना में 32 गुना अधिक फल प्रदान करता है

ज्योतिषीय गणना के अनुसार जब चंद्रमा कर्क राशि में और सूर्य मकर राशि में स्थित होते हैं, तब बत्तीसी पूर्णिमा का योग बनता है। वहीं रविवार को पुष्य नक्षत्र होने से रवि पुष्य अमृत योग का निर्माण होता है। शास्त्रों में रवि पुष्य योग को सभी योगों का राजा कहा गया है इस योग में किए गए शुभ कार्य स्थायी सफलता प्रदान करते हैं। इस दिन लिया गया संकल्प लंबे समय तक फल देता है। व्यापार निवेश भूमि क्रय गृह प्रवेश नई शुरुआत और दान पुण्य के लिए यह योग अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से रवि पुष्य योग को समय प्रबंधन और प्राकृतिक ऊर्जा संतुलन से जोड़ा जाता है। रविवार सूर्य का और पुष्य नक्षत्र पोषण स्थिरता और वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ऐसे समय में लिए गए निर्णय मनोबल आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को मजबूत करते हैं, जिससे कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।

पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण प्रभाव अधिक होता है। जिसका प्रभाव मानव मन और जल तत्व पर पड़ता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इस समय ध्यान मौन और प्रातःकाल स्नान करने से मानसिक संतुलन और एकाग्रता बढ़ती है। यही कारण है कि शास्त्रों में माघी पूर्णिमा पर मौन व्रत ध्यान और दीपदान का विशेष विधान बताया गया है।

मत्स्य पुराण के अनुसार माघी पूर्णिमा के दिन तिल गुड़ घी अन्न वस्त्र कंबल और पात्र का दान मोक्षदायी माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी तिल और गुड़ शरीर को ऊर्जा और ऊष्मा प्रदान करते हैं जो शीत ऋतु में स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं घी और अन्न पोषण संतुलन का आधार हैं। जिससे यह दान शारीरिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टियों से कल्याणकारी माना जा सकता। कल्पवास का समापन इसी दिन होने से इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

कल्पवास के दौरान अपनाए गए नियम संयम सात्त्विक आहार मौन और नियमित स्नान आधुनिक विज्ञान की भाषा में डिटॉक्स और माइंडफुलनेस प्रक्रिया के समान माने जा सकते हैं। जिससे शरीर मन और चेतना तीनों की शुद्धि होती है।

इस वर्ष उदया तिथि के अनुसार 1 फरवरी को प्रातः 05:52 से व्रत पूजन स्नान और दान का विधान प्रारंभ होगा। सर्वार्थ सिद्धि योग शुक्र उदय और रवि पुष्य अमृत योग के कारण यह माघी पूर्णिमा आध्यात्मिक उन्नति स्वास्थ्य लाभ मानसिक स्थिरता और स्थायी समृद्धि का अद्वितीय अवसर प्रदान कर रही है। यह तिथि वास्तव में आस्था विज्ञान और ज्योतिष के संतुलन का जीवंत उदाहरण है।

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