धर्म- समाज

23 साल बाद सूर्य का महासंयोग : 14 जनवरी 2026 मकर संक्रांति पर उत्तरायण षट्तिला एकादशी 6 दुर्लभ योग और जाने वाहन के बारे में

साल 2026 की मकर संक्रांति इस बार केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि खगोल शास्त्र ज्योतिष परंपरा और जनआस्था का विराट संगम बनने जा रही है। 14 जनवरी 2026 को सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे और इसी क्षण से उत्तरायण काल का शुभारंभ होगा। यह दुर्लभ संयोग लगभग 23 वर्षों बाद बन रहा है जिससे इस पर्व का महत्व कई गुना बढ़ गया है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव 14 जनवरी 2026 को दोपहर 3 बजकर 7 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस वर्ष पौष माह की षट्तिला एकादशी तिथि पर ही मकर संक्रांति पड़ रही है। इससे पहले ऐसा संयोग वर्ष 2003 में बना था संक्रांति और षट्तिला एकादशी का एक ही दिन होना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस दिन व्रत रखने के बाद स्नान दान कर पारण करने से एकादशी और संक्रांति दोनों का संयुक्त अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

इस वर्ष मकर संक्रांति पर सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग भी बन रहे हैं जो सभी शुभ कार्यों के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं। मकर संक्रांति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ होती है। इसी कारण इस पर्व को उत्तरायणी भी कहा जाता है।

शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है। इसलिए इस समय किए गए स्नान दान जप तप और पूजा का फल अक्षय होता है। इस वर्ष मकर संक्रांति पर महा पुण्य काल दोपहर 3 बजकर 7 मिनट से शाम 6 बजे तक रहेगा।

दान पुण्य की परंपरा मकर संक्रांति का मूल आधार है। इस दिन खिचड़ी का दान और सेवन विशेष फलदायी माना गया है। तिल गुड़ चावल उड़द हल्दी नमक धान और वस्त्रों का दान करने से पापों का नाश और जीवन में सुख समृद्धि आने की मान्यता है।

वर्ष 2026 की मकर संक्रांति पर कुल 6 दुर्लभ शुभ योग बन रहे हैं। वृद्धि योग जो उन्नति और सफलता का संकेत देता है। ध्रुव योग जो स्थिरता और मानसिक शांति प्रदान करता है। ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रभाव जो बुद्धि साहस और नेतृत्व क्षमता को बढ़ाता है। गुरुवार का दिन होने से भगवान विष्णु और सूर्य देव की संयुक्त आराधना का विशेष अवसर तथा तिल द्वादशी भीष्म द्वादशी का संगम जो पितरों की शांति और आशीर्वाद के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हर वर्ष संक्रांति एक विशेष वाहन पर सवार होकर आती है। वर्ष 2026 में संक्रांति का वाहन बाघ और उपवाहन घोड़ा माना गया है जो शक्ति ऊर्जा और साहस का प्रतीक है। इस वर्ष संक्रांति ने पीले वस्त्र धारण किए हैं। जाही के पुष्पों की सुगंध और पायस के भोग का संकेत दिया गया है, जिसे समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है।

देश के विभिन्न हिस्सों में मकर संक्रांति अलग अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। तमिलनाडु में इसे पोंगल कहा जाता है जिसका अर्थ उफनना या उबाल आना है। नई फसल के चावल से बने पोंगल व्यंजन के साथ यह पर्व मनाया जाता है। गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण के नाम से पतंग उत्सव की धूम रहती है जहां सूर्य किरणों के स्वास्थ्य लाभ को ध्यान में रखते हुए पतंग उड़ाई जाती हैं।

पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति पर गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व है। गंगासागर में गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी के संगम पर लाखों श्रद्धालु पवित्र स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं। उत्तर भारत में इसे खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मान्यता है कि इसी दिन देवी ने संक्रासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस वर्ष संक्रांति का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाएगा। 13 जनवरी को भोगी 14 जनवरी को मुख्य संक्रांति और 15 जनवरी को किक्रांति मनाई जाएगी।

मकर संक्रांति का अर्थ सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश है। यह पर्व प्रकृति किसान और जीवन के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है। नई फसल नई ऊर्जा और नए संकल्प के साथ मकर संक्रांति 2026 श्रद्धा आस्था और सकारात्मकता का महापर्व बनकर सामने आ रही है।

 

गोविंद मूंदड़ा

( ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ )

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