
गुस्से को उपशांत करने का प्रयास करे मानव : मानवता के मसीहा महाश्रमण
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में प्रेक्षाध्यान सम्मेलन का हुआ आयोजन
कोबा, गांधीनगर (गुजरात) : जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले, जन-जन को सन्मार्ग दिखाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्य महाश्रमणजी वर्ष 2025 का चतुर्मास अहमदाबाद के कोबा में स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में सुसम्पन्न कर रहे हैं। देश-विदेश से काफी संख्या में श्रद्धालु अपने आराध्य के इस चतुर्मास का आध्यात्मिक लाभ उठा रहे हैं। इसके साथ तेरापंथ धर्मसंघ से सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से जुड़ी हुई संस्थाओं व संगठनों का सम्मेलन, अधिवेशन, गोष्ठी आदि भी निरंतर आयोजन चल रहा है। सोमवार को भी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में प्रेक्षाध्यान सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में संभागी बने श्रद्धालु भी अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में उपस्थित थे।
सोमवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालु जनता को महातपस्वी आचार्य महाश्रमणजी ने ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि कई मनुष्य ऐसे होते हैं, जिन्हें यदि कठोर अथवा प्रतिकूल कह दिया जाए तो वे कुपित हो जाते हैं। यह आदमी के स्वभाव की बात बताई है। गुस्से में आ जाना तो आम तौर कमजोरी की बात ही मानी गई है। कई लोग बहुत जल्दी गुस्सा नहीं होते। जिसके जीवन में मोहनीय कर्म का प्रभाव ज्यादा होता है, वह अतिशीघ्र गुस्से में आ जाता है। जिनकी क्रोध की प्रकृति शांत हो गई है, वे बड़े शांत होते हैं। जो आदमी गुस्से में नहीं जाता, जिसके भीतर उपशम की चेतना पुष्ट होती है, वह उसके लिए बहुत ही अच्छी बात हो सकती है। कई साधु भी ऐसे हो सकते हैं, जो गुस्सा करते हैं। संत वह होता है, जो शांत होता है।

कभी गुरु शिष्य को कुछ कड़ा कहते हैं तो कई शिष्य-शिष्याएं इतने विनीत होते हैं कि वे गुरु की डांट को भी विनय भाव के साथ स्वीकार करते हैं। हम सभी में सहिष्णुता का भाव होना चाहिए। कई बार बड़ों को भी सहन करना हो सकता है। सुनने के बाद भी धैर्य और शांति में रहना साधना की बात हो सकती है।
गृहस्थ जीवन में सहन करना आवश्यक होता है। आदमी परिवार में रहता है। घर में बच्चे, बड़े, युवा आदि सभी तरह के लोग होते हैं। परिवार में कभी मौके पर कहना भी होता है, कभी सहना भी होता है और फिर भी शांति से रहने का प्रयास भी होना चाहिए। जहां तक संभव हो सके, समन्वय स्थापित करने का प्रयास होना चाहिए। जिसे भी गुस्सा ज्यादा आता हो, उसे अपने गुस्से को शांत करने का प्रयास करना चाहिए। दीर्घ श्वास की प्रेक्षा के द्वारा गुस्से को उपशांत किया जा सकता है। आदमी को इसके लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। प्रेक्षाध्यान के द्वारा भी अपने कषायांे को शांत किया जा सकता है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में प्रेक्षाध्यान का प्रयोग करते रहने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रेक्षाध्यान के द्वारा आदमी को गुस्से को उपशांत करने का प्रयास हो सकता है।
आचार्य की मंगल सन्निधि में प्रेक्षाध्यान सम्मेलन का मंचीय उपक्रम भी रहा। इस संदर्भ में प्रेक्षाध्यान एकेडमी के अध्यक्ष भैरुलाल चौपड़ा, जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लुंकड़, अध्यात्म साधना केन्द्र, दिल्ली के अध्यक्ष केसी जैन व प्रेक्षा इण्टरनेशनल के मंत्री गौरव कोठारी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। वर्तमान अधिशास्ता आचार्य महाश्रमणजी ने इस अवसर पर पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि वर्तमान में प्रेक्षाध्यान कल्याण वर्ष चल रहा है। इन वर्षों में प्रेक्षाध्यान का काफी विकास हुआ है। विदेशों में प्रेक्षाध्यान के ट्रेनर जाते हैं आज तकनीक के साथ प्रेक्षाध्यान का विकास हो रहा है। इसमें चार संगठनों का योग है। यथौचित्य इस कार्य में और अधिक गति का प्रयास किया जा सकता है।



