धर्म- समाज

सुंदर भविष्य निर्माण की प्रेरणा देता नवीन संवत्सर, उठो जागो नवीनता का वरण करो

मनुष्य नवीनता प्रेमी है। सुबह उठते ही नया सूरज देखकर आनंदित होता है। नये खिले फूल नयी ताजा हवा से मन प्रसन्न हो उठता है। आज नया वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। बेकार हुए पुराने
कैलेंडर हट गये है। नये कैलेंडर आ गए है। उनमें आपका कल झांक रहा है। मित्र,स्वजन ,परिचित और परस्पर व्यापारिक संबंध रखने वाले बन्धु एक दूसरे को नये वर्ष की बधाइयां दे रहे है। नये वर्ष के शानदार कार्ड और बहुमूल्य तोहफा का आदान प्रदान हो रहा है। नव वर्ष की शुभकामनाएं दी जा रही है। जो अतीत व्यतीत हो गया,उसका गीत गाना कोई अर्थ नही रखता।किंतु जो सामने आ रहा है ,वह आपके हाथ मे है। इस वर्ष को आप अपनी उदात्त संकल्पशीलता के बल पर सुंदर से सुंदर,महत्वपूर्ण बना सकते है।जीवन का स्वर्णिम वर्ष बना सकते है।

आज जो बधाइयां, शुभ कामनाएं दी जा रही है वह मामूली चीज नही है। वह आपके भविष्य का निर्माण करने में नींव का काम करती है।सज्जनों की शुभकामनाएं किसी ऋषि के वरदान से कम नही होती। शुभ कामनाएं शुभ वायुमंडल का निर्माण करती है।शुभ प्रेरणाएं जगाती है और नई ऊर्जा प्रदान करती है। ये शुभ कामनाएं आपको सावधान करती है कि आपका आने वाला कल मंगलमय हो,इसलिए आप आज ही तैयार होकर अपने कर्तव्य का चिंतन करे और नये कार्यक्रम, नई योजनाएं ऐसी बनाए जो आपके जीवन के न केवल भौतिक विकास में,अपितु आध्यात्मिक विकास में,आत्म अभ्युदय में भी सहायक बने।

स्तम्भ बनकर आपके जीवन महल को सहारा देवे और परिवार, समाज, राष्ट्र एवं समस्त विश्व के कल्याण में योगदान दे सके।
जलता हुआ दीप दूसरे दीपो को जला सकता है। बुझा हुआ दीप अंधेरे में ही पड़ा रहता है। इसलिए प्रज्वलित दीपक बनना चाहिए। संसार मे ज्योति बनकर जिओ, जो दुसरो को प्रकाश दे।चिंगारी बनकर जिओ ,ताकि अंधेरों को रोशनी में बदल सको।जिंदगी बहुत मूल्यवान है इसका एक एक पल मूल्यवान है कि हम इन पलो में शताब्दियों का इतिहास रच सकते है। युग की धारा बदल सकते है।इस प्रवाह को मोड़ सकते है।
डाली से गिरते हुए विदा होते फूल को देखकर नई खिली कली मुस्कराने लगीं, तब फूल उठा, हमारी तो कट गई,हम जा रहे है।अब तुम अपना ख्याल करो। नया संवत्सर मुस्कराते मित्र की तरह खड़ा अभिवादन कर रहा है।

हिन्दू पुराण,जो सृष्टि रचना में विश्वास रखते है उनकी मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ला प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जगत की रचना प्रारम्भ की थी। अवतारवादी कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के मात्स्यावतार का आविर्भाव भी आज के दिन हुआ था और सतयुग का प्रारंभ भी आज ही के दिन हुआ,इसलिए आज चैत्र शुक्ला प्रतिपदा नये युग का ,नये सवंत्सर का प्रथम दिन माना जाता है। चैत्र महीना अनेक महापुरूषो से संबंधित है। चैत्रवदी चौथ भगवान पार्श्वनाथ के केवलज्ञान का पवित्र दिन है। चैत्र वदी अष्टम को आदिदेव ऋषभदेव के जन्म कल्याणक है। भगवान ऋषभदेव ने संसार को श्रम, पुरुषार्थ, व्यापार,शिक्षा, राजनीति आदि का ज्ञान देकर चैत्र वदी नवमी के दिन दीक्षा ग्रहण की थी।

नव संवत्सर की प्रेरणा

नया संवत्सर हमे अतीत को भूलने की प्रेरणा देता है। जो चला गया उसका शोक मत करो,जो खो दिया सो खो दिया। यदि आपने पिछले वर्ष को सार्थक कर दिया तो वह समय तुम्हारा हो गया,यदि सार्थक नही किया तो वह हाथ से निकल गया। जो राते बीत जाती है वह लौटकर नही आती। समय की सुई को घूम जाती है,वह वापस मुड़कर नही आती। आज नव वर्ष के अवसर पर कोई न कोई शुभ संकल्प मन मे लीजिए।संकल्प ऊर्जा का महा प्रवाही महास्त्रोत है। इसमें बल् होता है।एक लक्ष्य होता है।

गौतम प्रतिपदा और गोवर्धन पूजा

दीपावली के बाद की प्रतिपदा पड़वा को वैदिक परंपरा में गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है। लोग अपने घरों के सामने गोवर्धन पर्वत का प्रतीक गोबर का पहाड़ बनाकर उसकी पूजा करते है और अपने पशुधन की संवृद्धि की कामना करते है। गोवर्धन पूजा के साथ श्रीकृष्ण की प्रेरक घटना जुड़ी हुई है।किशोर श्री कृष्ण ने देखा,लोग इंद्रदेव की पूजा करते है और उनसे अपने धन धान्य की समृद्धि की कामना करते है। कृष्ण ने पूछा यह इंद्र देव की पूजा क्यो करते है? लोगो ने कहा इंद्र महाराज समय पर जल वृष्टि करते है,खेतो में धन्य धान्य की वृद्धि होती है इसके लिए हम इंद्र की पूजा करते है कृष्ण ने कहा समय पर वृष्टि होना,धूप होना,खेतों में धन धान्य उत्तपन्न होना यह तो सृष्टि का सहज कर्म है। इसमें इंद्र का लेना देना क्या है?अगर इंद्र यह सब कुछ करता भी है तो प्रजा का पालन करना,सरंक्षण करना इंद्र का कर्तव्य है।

इसमें अहसान और उपकार की क्या बात है?कृष्ण के समझाने से लोगो ने इंद्र पूजा बन्द कर दी।इंद्रदेव कुपित हो गये और सात दिन तक लगातार गोकुल में मूसलाधार वर्षा होती रही,तूफान आते रहे। चारो तरफ जल प्रलय सा मच गया। गोकुल की गाये और जनता इधर उधर भागने लगे।तब भगवान श्रीकृष्ण ने छत्र की तरह गोवर्धन पर्वत को उंगली में उठा लिया और सब प्रजा को उसके नीचे आश्रय दिया।सात दिन मूसलाधार बरसने पर भी गोवर्धन के नीचे आश्रय लेने वाले बचे रहे। अंत मे इंददेव हार मान गए।कृष्ण के सामने क्षमा मांगने लगे। उसी का प्रतीक गोवर्धन पूजा पड़वा नये साल में लोग घरों के सामने पूजते है। गौतम प्रतिपदा और गोवर्धन पूजा के साथ ही नए साल की आपको और आपके परिवार को ढेर सारी शुभकामनाएं।साल मुबारक।

( कांतिलाल मांडोत )

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