धर्म- समाज

बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण ही सच्ची संपत्ति : राष्ट्र संत सुधांशु महाराज

रामलीला मैदान में यज्ञ व सत्संग के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, संस्कार और आत्म परिवर्तन की प्रेरणा

सूरत। विश्व जागृति मिशन द्वारा संचालित बालाश्रम (अनाथाश्रम) के सहायतार्थ रामलीला मैदान में आयोजित विराट भक्ति सत्संग का समापन रविवार को चौथे एवं अंतिम दिन श्रद्धा, भक्ति और राष्ट्र भावना के साथ हुआ। इस अवसर पर राष्ट्र संत सुधांशु महाराज ने भक्तों के साथ यज्ञ में सहभागिता करते हुए राष्ट्र के सर्वांगीण विकास, शांति और समृद्धि के लिए आहुतियां अर्पित कीं।

इसके पश्चात सत्संग को संबोधित करते हुए संत सुधांशु महाराज ने गुरुदेव की शरण से लेकर परमात्मा के मिलन तक के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि इस संसार में हर व्यक्ति किसी न किसी सहारे की तलाश में है, जबकि सच्चा और अंतिम सहारा केवल परमात्मा ही है। संसार की समस्त व्यवस्थाएं उसी परम सत्ता के आधार पर टिकी हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह परमात्मा की कृपा और मुकद्दर से मिलता है। जब संसार के सभी रिश्ते-नाते टूट जाते हैं, तब केवल प्रभु का ही सहारा शेष रहता है।

महाराज ने कहा कि बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण ही सच्ची संपत्ति है। सच्चा प्रेम वह नहीं जो बच्चों को कमजोर बनाए, बल्कि वह है जो उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस दे। अंत में उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति चमकता हुआ दीपक के समान है, जो आंतरिक मलीनता से ढका हुआ है। जब व्यक्ति भीतर से बदलता है, तभी समाज और राष्ट्र का उत्थान संभव है।

संत सुधांशु महाराज ने जीवन में आदतों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन को व्यक्ति नहीं, बल्कि उसकी आदतें संचालित करती हैं। जैसा अंतःकरण बनता है, वैसा ही व्यक्ति का स्वरूप होता है। पुरानी गलत आदतों को बदलने के लिए नई सकारात्मक आदतें अपनानी चाहिए और त्याग योग्य आदतों से वैराग्य रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने जीवन को सही ढंग से “डिजाइन” करना सीख लेता है, वही कीर्तिमान स्थापित करता है।

समाज में बढ़ते फैशन और स्वार्थ प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए महाराज ने कहा कि आज सनातन समाज में फटे कपड़ों को फैशन बना लिया गया है और स्वार्थ पूर्ति के लिए लोग अनुचित आचरण से भी पीछे नहीं हटते। उन्होंने सनातनियों से अपने गुरुदेव और प्रभु के प्रति अटूट श्रद्धा बनाए रखने का आह्वान किया।

शिक्षा और संस्कार के संतुलन पर जोर देते हुए संत ने कहा कि केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं है, बल्कि सु-संस्कार भी उतने ही आवश्यक हैं। संस्कारों के अभाव में शिक्षित व्यक्ति भी समाज के लिए घातक बन सकता है। सु-संस्कारों से ही घर स्वर्ग बनता है। उन्होंने कहा कि भारत की नई पीढ़ी के निर्माण के लिए समय, संस्कार और मार्गदर्शन देना आवश्यक है।

धर्माचार्य रामकुमार पाठक एवं प्रमुख गोविन्द डांगरा ने बताया कि रविवार को संजीव चतुर्वेदी, नारायणदास कामरा परिवार, दीपक इजारदार, फोस्टा के प्रमुख कैलाश हाकिम, रीना राजेन्द्र उपाध्याय, पूर्व शासकपक्ष नेता गिरिजाशंकर मिश्रा सहित अन्य महानुभावों ने महाराजजी से आशीर्वाद लिया।

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