
चातुर्मास समाप्ति का अत्यंत गरिमापूर्ण दिन कार्तिक पूर्णिमा
आज कार्तिक पूर्णिमा है। चातुर्मास समाप्ति का दिवस है।आज का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक सत्पुरुषों का संबंध इस दिन के साथ जुड़ा है। आज के दिन अनेक महान आत्मा ने जन्म लिया और हमारे आदर्श बने। उनका पुण्य स्मरण हमारे मन मे नई प्रेरणा और स्फूर्ति का संचार करता है। हमारी समग्र संस्कृति पर उनका उपकार है। उपकारी जनो के उपकारों को याद करना,कृतज्ञता है।
धर्मपरायण लौंकाशाह
धर्मप्राण क्रांतिकारी वीर लौंकाशाह जैसी महान आत्मा आज के ही दिनवतरित हुई। उस युग मे धार्मिक क्षेत्र में गहन अंधकार परिव्याप्त था। धर्म के नाम पर कई तरह के पाखण्ड और आडम्बरो को पुष्ट किया जा रहा है। लौंकाशाह ने जब यह सबकुछ देखा तो उनका अंतर उद्देलित हुए बिना नही रहा।उन्होंने शास्त्रो का लिपिकरण करते हुए गहरा अध्यन अनुशीलन किया एवं निर्ग्रन्थ संस्कृति में तेजी से प्रविष्ट होते जा रहे शिथिलाचार और विकृत आचार का उन्मूलन करने के लिए एक क्रान्त दृष्टा के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया।
लौंकाशाह श्रावक ही थे,लेकिन उनका आत्मबल प्रखर था।वे तत्वज्ञ थे। साथ ही उनके जीवन मे व्रतों की तेजस्विता एवम निर्मलता थी। संयम साधना के क्षेत्र में विकृतियों का पोषण उन्हें ठीक नही लगा।धर्म और क्षेत्र के संयम में जो आडम्बर खुलकर चल रहे थे,उन्हें दूर करने के लिए उन्होंने सिंहनाद किया। उनके सिंहनाद में सत्य का बल था।किसी भी व्यक्ति या परम्परा विशेष के प्रति दुर्भाव नही था। व्यक्ति जब सत्य का आश्रय लेकर चलता है तो उसका प्रभाव होता ही है और ऐसा ही हुआ।
गुरु नानकदेव
मानवता के मूर्तरूप नानक देव का जन्म भी आज ही के दिन कार्तिक पूर्णिमा को ही हुआ था। वे गरीबो के मसीहा थे।उन्होंने ज्ञान भक्ति व प्रेम का संदेश दिया। अहिंसा धर्म का प्रचार करते हुए कहा था कि जो खान पान को शुद्ध रखकर प्रभु भजन करता है,उसका जीवन सार्थक सफल हो जाता है। उनकी वाणी है-जो रत लगे कपड़े जापा होवे पलीत।जो रत पीवे मानुषा, तीन क्यो निर्मल चित। उन्होंने संगत और पंगत की सीख देते हुए कहा है-
संगत करो तो साधु की,पंगत करो तो लंगर की
साधु संगत में सच्ची सीख मिलती है और लंगर में बिना भेदभाव सभी एक ही पंगत में बैठते है। संगत और पंगत का अर्थ है। पहले भजन करो,फिर भोजन करो। भजन और भोजन में भेदभाव नही होना चाहिए। भूखा द्वार पर हो तो उसे भोजन कराना चाहिए।भारतीय संस्कृति का यही आदर्श है।
आचार्य हेमचन्द्र
इसी तरह महान ज्योतिर्धर हेमचन्द का जन्म दिवस भी कार्तिक पूर्णिमा का ही है। हेमचंद्राचार्य से सम्पूर्ण जैन जगत परिचित है। साहित्य के क्षेत्र में आचार्य हेमचन्द्र का जो महान योगदान रहा है। वह एकदम अभूतपूर्व एवम अद्वितीय है। जैन व्याकरण,न्याय कोश और हेमलिंगा नुशासन जैसे ग्रंथो की रचना करके उन्होंने बहुत बड़े अभाव की पूर्ति की।
साहित्यिक,राजनैतिक एवम जैन धर्म के प्रचार प्रसार में आचार्य हेमचन्द की विशिष्ट भूमिका रही है। सिद्धराज जयसिंह और सम्राट कुमारपाल जैसे महाराजा उनके चरणों के अनन्य उपासक थे। आचार्य के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग है। कुमारपाल सम्राट ने देखा कि आचार्य हेमचन्द मैली एवम साधारण सी चादर गुदड़ी ओढ़े हुए है। उसे यह ठीक नही लगा।वह आचार्यश्री के निकट आया और कान में धीरे से कहा।
गुरुदेव आपने यह चादर ओढ़ रखी है,यदि इसे बदल लें तो अच्छा रहेगा। आचार्य ने कहा, क्यो,चादर को बदलने की बात है,इससे अच्छा और बुरा जैसा क्या है? कुमारपाल ने कहा इसलिए कि आप मेरे गुरु है और आप यदि ऐसी चादर ओढ़े हुए प्रवेश करेंगे तो मुझे शर्म लगेगी।लोग मुझे क्या कहेंगे।
आचार्य ने कहा -कुमारपाल तुम्हे मेरी इस चादर की तो शर्म आती है,लेकिन तुम्हारे इस राज्य में सैंकड़ों हजारो असहाय माताएं,विधवाएं किस तरह का अभावपूर्ण जीवन गुजार रही है? तुमारी जनता का जीवन कठिनाईयो की चक्की में पिसा जा रहा है,क्या कभी तुमारा ध्यान उस और गया है?कुमारपाल को अपनी भूल का अहसास हुआ और कहा जाता है कि उसने उसे उसी समय एक घोषणा की कि कई करोड़ की राशि मैं गरीब विधवाओं की सहायता में लगाऊंगा। उसने अपनी प्रजा के अभ्युदय के लिए आचार्य हेमचन्द के सदुपयोग से स्वयं को हर तरह से न्योछावर कर दिया।
श्रीमद राजचन्द
इसी तरह श्रीमद राजचन्द का नाम भी आज की पूर्णिमा के साथ जुड़ा हुआ है।वे गृहस्थ जीवन मे थे,किंतु किसी संत से उनका जीवन कम महत्वपूर्ण नही था। उन्होंने आत्मतत्व की खोज में अपने आप को सर्वात्माना समर्पित कर दिया।गृहस्थ में रहते हुए एक विशिष्ट जीवन जिया। उनके जीवन के कण कण में अध्यात्म समाया हुआ था। जन्म,जीवन और मरण को,साधना से जुड़कर उन्होंने सार्थक बना डाला।वे जवाहरात के व्यापारी थे। इस प्रकार आज के दिन ऐसे कई सत्पुरुष इस धरती पर हुए है। इन सत्पुरूषों ने हमारी संस्कृति गौरवान्वित की है।
हम इन सभी का आस्था और आदर के साथ स्मरण कर रहे है। इन सत्पुरूषों के द्वारा निर्दिष्ट पथ पर हम भी अपने आपको गतिशील करके जीवन को भव्यता प्रदान करने का प्रयत्न करें। जीवन सद्गुणों से ही सुसज्जित बनता है। जो भी इन महापुरुषों का अनुसरण करेंगे,उनका जीवन महान बनेगा,विशिष्टता ग्रहण करेगा।
( कांतिलाल मांडोत )