सूरत से श्रमिकों का पलायन, सरकार से उचित कदम उठाने की लगाई गुहार

सूरत में दिनोंदिन कोरोना से परिस्थिति बदतर होती जा रही है। लोगों में डर का माहौल देखने को मिल रहा है। इसका सीधा असर उद्योग-धंदे पर हो रहा है। हीरा और कपड़ा उद्योग में काम करने वाले श्रमिक अब अपने वतन की ओर चल पड़े है। उन्हें डर सता रहा है कि पिछले दिनों की तरह परेशानी का सामना करने से अच्छा है कि समय रहते निकला जाए। सूरत में श्रमिकों का पलायन से चिंतित चैम्बर ऑफ कॉमर्स ने इस बारे में कलक्टर और राज्य सरकार से इन्हें रोकने के लिए उचित कदम उठाने की मांग की है।

सूरत में रोजाना 600- 670 कोरोना के मामले सामने आ रहे है। सरकार की ओर से नाइट कफ्र्यू भी लगा दिया गया है। जिससे अब श्रमिकों को फिर से लॉकडाउन होने का डर सता रहा है। कहीं फिर से फंस नहीं जाए इसलिए श्रमिक उत्तर भारत वतन लौट रहे है। प्रशासन की ओर से कोरोना टेस्ट और वेक्सिनेशन चल रहा है लेकिन दूसरी ओर कोरोना थकने का नाम नहीं ले रहा है।

कपड़ा यूनियन के अध्यक्ष उमाशंकर मिश्रा व प्रवक्ता शान खान ने बताया कि सिर्फ कोरोना पलायन के लिए जिम्मेदार नहीं है, दूसरा कारण यह भी है कि इन दिनों गांव में पंचायतों के चुनाव, शादी-ब्याह और खेती के कामों के कारण भी लोग जाना चाह रहे है। सूरत में कोरोना के साए में रहने से अच्छा गांव में रहना मुनासिब समझ रहे हैं। वहीं गांव में चुनाव होने से उन्हें रूपए देकर वोटिंग के लिए बुलाया जा रहा है। इस वजह से 2500 रूपए किराया चुकाकर भी निजी बसों में वतन लौट रहे है। जिससे आनेवाले दिनों में कपड़ा, हीरा बाजार और औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों की कमी पैदा होगी।

चेम्बर ऑफ कामर्स ने पलायन रोकने के लिए सुझाव दिया है कि सूरत में कोरोना से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा के श्रमिकों के पलायन का भय होने से यहां से जाने वाली बसों की बैठक केपिसिटी घटा दी जाए। सूरत के औद्योगिक इकाईयों में वैक्सिनेशन और टेस्टिंग सेन्टर बड़े पैमाने पर शुरू किए जाए। श्रमिक बस्तियों में सेनेटाइजेशन होना चाहिए। इतना ही नहीं जिन औद्योगिक इकाइयों में सोश्यल डिस्टन्स, मास्क तथा अन्य तमाम कोरोना की गाइडलाइन का पालन होता हो उन्हें रात्रि करफ्यू के समय रात के 8 से सुबह 6 बजे तक चालू रखने की छूट मिलनी चाहिए। औद्योगिक इकाइयों मे जीवन आवश्यक चीजों की आपूर्ति कम नहीं हो।

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