धर्म- समाज

भारत की आजादी के 75वे वर्ष का जश्न देशभक्ति और अमृत महोत्सव के रूप में राष्ट्रीय गीत का समुचारण और तिरंगे को फहराना राष्ट्रीय गौरव

पंद्रह अगस्त राष्ट्र की दासता से मुक्ति कामना के साकार होने का दिवस है। वर्षो से हमारा देश अंग्रेजो की परतंत्रता में विवश जी रहा था। कहने को तो हम राष्ट्र में जी रहे थे, पर हम पूरी तरह से पराधीन एवं परतन्त्र थे। गुलामी की बेडिय़ों से जकड़ा आम जन मानस पूरी तरह से अशान्त और संत्रस्त था। पराधीन सपनहु सुख नाही अर्थात जो पराधीन और परतन्त्र होता है,उसके जीवन मे सुख स्वपन में भी सुलभ नही होता।

हमारे भारत वर्ष के हजारो लाखो देशभक्तों ने देश को परतंत्रता से मुक्ति के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। वीर बालाओ ने अपने पतियों,पुत्रो और भाइयों को हंसते हंसते देश की आजादी के लिए समर हेतु विदा किया एवं अंतत: स्वतंत्रता, आजादी प्राप्त कर ही ली। परतंत्रता की बेडिय़ों से मुक्त होने पर जिस सुख और संतोष की जो अनुभूति होती है,वह शब्दातीत है। हमारे देश की स्वतंत्रता लौट आई। आजादी के मंगल स्वरों से देश का कोना कोना गूंज उठा। जन जन के ह्दय कमल खिल उठे। हमारे देश मे 75 वर्ष की आजादी के बाद भी देश अराजकता ग्रस्त है। हिंसा,झूठ,शोषण,अनीति,अत्याचार,भ्रष्टाचार,बलात्कार,आतंकवाद आदि की जो स्थितिया कदम कदम पर जो दिखाई देती है। इतनी तो गुलाम देश मे भी नही थी।आज आधुनिक टेक्नोलॉजी और अर्थक्रान्ति में देश मे प्रगति हुई है। इतने वर्षों में अंतरिक्ष और सैन्य शक्ति में वृद्धि देखी जा सकती है। हमने राष्ट्र गीत का समु चारण और तिरंगे ध्वज को फहरा देना ही यदि राष्ट्र गौरव को आधार मान लिया गया है तो यह नितांत भुलभरा दृष्टिकोण है और इस दृष्टिकोण में हमे सुधार लाना चाहिए।

किसी को अपना गुलाम बनाना है तो उस समाज या राष्ट्र की संस्कृति को नष्ट कर दो।बस उस राष्ट्र के निवासी सदा सदा के लिए गुलाम बन जाएंगे। यही तो हुआ हमारे देश में।एक हजार वर्षों तक विदेशी आतताइयों ने बर्बर हमले किये और तलवार के दम पर हमारी हुकूमत कायम करके उन्होंने भारत की संस्कृति को पंगु बनाने का भरसक प्रयास किया। आश्रमो को जलाया,मंदिरों को गिराया,अपनी भाषा और विचार हम पर लादने की भरपूर कोशिश की,धर्म परिवर्तन करने को बाध्य किया गया,मगर क्या हुआ? मुगल आये और वे भी इसी धरा में समा गए। वे अपनी संस्कृति का अधिक प्रचार नही कर पाये, बल्कि इसी संस्कृति के उपासक बनकर रह गये। उनकी फ़ारसी भाषा यहा आकर उर्दू में रूपांतरित हो गई। लिपी बदल गई,मगर क्रिया, विभक्ति, सर्वनाम और अव्यव उसने हिंदी के ही लिए। इसी तरह उर्दू भी हिंदी का ही रूप बनकर रह गई।

भारत की संस्कृति पर सबसे बड़ा हमला अंग्रेजों ने किया। पश्चिम की भौतिक चकाचौध के कृत्रिम प्रकाश में हम अंधे हो गये। अंग्रेज दो सौ वर्षों तक हमारी संस्कृति को धुन की तरह खाते हुए उसे खोखला करते रहे। उसी का प्रभाव है कि महानगरों की संस्कृति हमें भारतीय कम विदेशी अधिक लगती जा रही है। हमे स्वतंत्रता दिवस के हार्द्ध को समझते हुए शारीरिक,मानसिक,आत्मिक सभी दृष्टियों से निर्बन्ध स्वतंत्र जीवन जिए। हमारे स्वतंत्र जीवन का उद्देश्य स्वयं के साथ व्यक्ति, समाज व राष्ट्र की प्रगति के साथ जुड़ा हुआ होना चाहिए। जिन सपूतो ने अपनी कुर्बानी देकर हमे स्वतंत्रता का गौरव दिया है,उनके साहस और आदर्शों को हमे हमेशा स्मृति पटल पर सदैव तरोताजा रखना है।

(कांतिलाल मांडोत)

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