
भारत के शूरवीर और आदर्श महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप की जन्म जयंती पर विशेष
(कांतिलाल मांडोत)
उदयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र महाराणा प्रताप की जन्म जयंती पूरा देश मना रहा है। महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ में हुआ था। शूरवीर माता ने प्रताप को बचपन से ही अंगारों पर चलना सिखाया। भारत के महान योद्गा महाराणा प्रताप ऐसे शूरवीर थे,जिसे दुश्मन भी सलाम करते थे।उनके नाम से कांपते थे। महाराणा का नाम इतिहास में साहस और वीरता के लिए सदा के लिए अमर है। महाराणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए दुश्मनों से कभी भी हार नही मानी। महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर और वीरता के महान योद्धा का आज भी लोग उनका नाम स्मरण करने के बाद पानी मुँह में डालते है। अपनी मातृभूमि के लिए असहाय वेदना सहन करके मेवाड़ को आजाद रखा। महाराणा प्रताप वीरता और युद्ध कला के लिए जाने जाते है। अपने राज्य में प्रजा को कभी दु:खी नही देखते थे। उन्होंने आखिरी सांस तक मेवाड़ की रक्षा की थी। आज विश्व मे उनका नाम आदर और सत्कार से लिया जाता है। महाराणा प्रताप को भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी भी कहा जाता है।
स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप ने विषम परिस्थितियों में भी संघर्ष किया। अपनी अदम्य इच्छाशक्ति ,अपूर्व शौर्य और रण कौशल्य से मेवाड़ को स्वाधीन करने में सफल हुए। वे एक कुशल राजनीतिज्ञ,आदर्श संगठनकर्ता और देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए हमेशा कटिबद्ध रहते थे। महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के ऐसे महानायक है ,जिनकी अनन्य विशेषताओं पर भारतीय इतिहासकारों ने नही लेखकों ने ही अपनी लेखनी चलाई है। महाराणा प्रताप की शूरवीरता की गाथा विदेशो तक पहुँची है। यूरोप भी महाराणा के पावन देश भारत और कर्मभूमि,वीरभूमि मेवाड़ में जन्म लेने वाले को सौभाग्यशाली मानते है। महाराणा प्रताप सारी जिंदगी अपने द्रढ संकल्प पर अड़े रहे। प्रताप स्वदेश पर अभिमान करने वाले वीर पुरुष थे। आज राजपूत समाज बड़े गर्व से महाराणा प्रताप को प्रात:स्मरणीय ,आदर्श पुरुष के रूप में सम्मान देकर अपने आप मे गौरवान्वित महसूस करती है।महाराणा प्रताप की जयकार हर वर्ग और हर समाज के लिए एक अनुकरणीय अनुभूति है। जो इस माटी में जन्म लेकर इस माटी के कण कण की सुगंध दशो दिशाओं में पहुंचा दी है। स्वतंत्रता के पुजारी महाराणा प्रताप ,दृढ़ मनोबल और एक वीर महापुरुष थे। अखबर ने अपना समस्त बुद्धिबल, बाहुबल और धनबल लगा दिया,लेकिन महान योद्धा और शूरवीर को झुका नही सका। महाराणा प्रताप ने अपने गुरु,भगवान और माता पिता के सिवाय कभी किसी के सामने सिर नही झुकाया।
अरे घास री रोटी थी, जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो,राणा रो सोयो दु:ख जाग्यो और राणा प्रताप की खुदारी, भारत माता की पूंजी है। ये वो धरती है जहां कभी ,चेचक की टापे गूंजी है। जैसे शोर्यवीर गाथा लोगों के होंठों पर गूंजती रहती है। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक उदयपुर जिले के गोगुन्दा में हुआ था। महाराणा प्रताप का चेतक घोड़ा था। जो महाराणा प्रताप के साये के साथ चलता था। जब जब महाराणा प्रताप का इतिहास दोहराया जाएगा। उस दौरान चेतक का नाम जरूर लिया जाएगा। चेतक के पैरों से बहुत खून निकल रहा था,लेकिन महाराणा प्रताप को अपने उपर बैठाकर सुरक्षित स्थान पर ले गया। घायल होते हुए भी महाराणा को अपनी पीठ पर लादे हुए थे।चेतक के नाम का एक स्मारक बनवाया गया। जहाँ उसकी मृत्यु हुई। हल्दी घाटी छोड़ महाराणा प्रताप कोलयारी पहुंचकर घायल सैनिको का इलाज कराया। महाराणा प्रताप जैसे इतिहास में एक बार ही पैदा होते है। जो देवदूत बनकर लोगो का संताप दूर करते है। उन्होंने अपनी माटी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। आज उनकी जन्म जयंती पूरा विश्व मना रहा है। ऐसे महान देशभक्त,शूरवीर को शत शत नमन।