धर्म- समाज

पर्वाधिराज पर्युषण : विश्व शांति का दिव्यास्त्र है अहिंसा

मानव जीवन मे धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक वस्तु का अपना धर्म है। जो अपने धर्म मे गिर जाता है,वह फिर किसी काम का नही रहता है। सूर्य का धर्म है उष्मा और प्रकाश प्रदान करना। यदि वह कार्य नही करे तो उसका क्या महत्व है?जल का धर्म है शीतलता देना। यदि जल यह कार्य नही करे तो फिर किस काम का? यही स्थिति मानव की है। उसका अपना कार्यक्षेत्र है। मानव जीवन मे धर्म को सर्वोपरि स्थान पर स्थापित किया गया है। मानव के चतुर्विध पुरुषार्थो में धर्म का स्थान अर्थ ,काम एवं मोक्ष से पहले आया है। इतना सबकुछ जानते हुए भी मानव धर्म का विस्मरण करता जा रहा है। इसी का ही परिणाम है कि अहिंसा का स्थान हिंसा ने,आचार का स्थान अनाचार ने और शांति के स्थान पर अशांति ने अपने पांव फैला दिए है।
जीवन मे पहला स्थान धर्म का
जीवन मे पहला स्थान धर्म को मिला है। वही धर्म मे प्रथम स्थान अहिंसा को प्रदान किया गया है। अहिंसा जैनत्व की रीढ़ है। वर्तमान युग मे अहिंसा वैज्ञानिको के लिए अनुसंधान का विषय बन गया है। जैनाचार्यो ने अपने अनुभवों के साथ अहिंसा का अति सूक्ष्म विवेचन करने का प्रयास किया है। अहिसा के समान अन्य कोई धर्म नही है।
परम धर्म सुति विदित अहिंसा
तुलसीदास ने अहिंसा को परम धर्म बताया है। वेदों में विदित अहिसा परम् धर्म है।ऐसा अहिसा धर्म कहा पर है? हिसा अहिंसा दोनों का संबंध आत्मा से है,भावना से है।
अहिसा एक दिव्यास्त्र
अहिसा के दिव्यास्त्र द्वारा ही महात्मा गांधी ने स्वराज्य पाने का अपना भारतीय स्वाधीनता का आंदोलन चलाया और उन्हें अपने कार्यो में पूर्ण सफलता भी मिली। कुछ नासमझ लोग जो अहिंसा से पूर्ण परिचित नही है,वे उसकी आलोचना करते है। उनके अनुसार आज के युग मे अहिंसा की बात कैसे सोची जा सकती है। अहिंसा तो साधक है।बाधक नही बनती। गृहस्थ हो या शासक ,अहिंसा तो जीवित रहने की सिख देती है। दाहित्व का निर्वाह करना भी धर्म का पालन करना है।
हिसा कायरता है
तुच्छ स्वार्थ के लिए यदि हम हिंसा का सहारा लेते है तो हमारे जैसा । मूर्ख कौन होगा? आज विश्व मे दो सौ के आसपास देश है। सभी राष्ट्रों का अपना धर्म है। वे अपने आदर्श नही त्यागते है,फिर भी हमे आदर्श त्यागने की जरूरत क्यो पड़ती है। अपनी अच्छाई को भुलाकर दुसरो की बुराई स्वीकारना कोई अच्छी बात नही है। विश्व ने भारत को ही धर्म गुरु माना है। इस देश मे हिंसा करने की शासकीय स्वीकृति भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति पर कालिख पोतने के समान है।
विश्व मे पशु पंक्षियों का वध करके कोई राष्ट्र सुखी नही हो सकता । हमारी तरह उनमें भी जीवात्मा है। सारी उम्र आप जिस गाय का दूध पीते है। वृद्धावस्था में उसी गाय को पैसों की लालच में कसाई को बेच देते है। यह कहा तक न्याय संगत है?क्या यही एक इंसान का धर्म है? यह तो कृतज्ञता है और कृतज्ञता ऐसा पाप है,जिसका कोई प्रयाश्चित ही नही है।
धर्म को समझकर ही धार्मिक बन सकते
हम धर्म को जाने बिना अहिंसा का ज्ञान नही हों सकता है।हम धर्म को समझकर ही धार्मिक बन सकते है।हम जैन अहिंसक जरूर है,लेंकिन कायर नही है।हम समय आने पर पीछे नही हटते है।हमे अपना बचाव करना आता है।
अहिसा  धर्म ही जग को बचायेगा
हम धर्म को जाने ,समझे और उसे जीवन मे उतारने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहे। धर्म को जानने वाला अहिसा का पथ कैसे त्याग सकता है।? जैसे दाहकता और उष्मा से रहित अग्नि की कल्पना नही की जा सकती वैसे ही अहिंसा के बिना धर्म का कोई अस्तित्व ही नही है। अहिसा तो स्वयं में ही धर्म है और यही धर्म विनाश की और बढ़ते कदमो को रोक सकता है। हिंसा में आंसू हैआग है तो अहिंसा में करुणा और प्यार है। हिसा किसी को हर समय के लिए हंसा नही सकती। रावण और कंस की हंसी,उनका अट्हास एक न एक दिन नष्ट हो जाता है। आज विश्व को हिंसा की आग से निकलने की आवश्यकता है। अगर हमने समय रहते अहिंसा का पथ स्वीकार नही किया तो बाद में रोना ही पड़ेगा। हमे अपने आप को इस सुंदर संसार को बचाना है तो धर्म के प्राणतत्व या उसकी चेतना का अहिंसा मार्ग ही बचा सकता है। जहाँ निर्भय होकर जीवन जी सके। जीवन को धर्मयुक्त बनाने के लिए अहिंसा का भाव जगाये।
(कांतिलाल मांडोत)

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