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मिश्रित फसलों की प्राकृतिक खेती कर लाखों की कमाई कर रहे अम्बिका तहुसील के वेलणपुर गांव के वनमालि पटेल

तुरई, बैंगन, मिर्च, दूधी जैसी सब्जियों के साथ गन्ने की खेती कर वनमालि बने आत्मनिर्भर

सूरत: युवाओं को भी मात दे देने वाली ऊर्जा रखने वाले सूरत जिले के अम्बिका (महुवा) तहसील के वेलणपुर गांव के भाठेल फलिया में रहने वाले 68 वर्षीय वनमालिभाई रावजीभाई पटेल, जो कृषि विस्तार अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हैं, उन्होंने प्राकृतिक खेती के माध्यम से अपने सेवानिवृत्ति जीवन को सक्रिय बनाकर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया है। युवाओं के मार्गदर्शक बने इस प्रगतिशील किसान वनमालिभाई ने सब्जियों सहित मिश्रित फसलों की प्राकृतिक खेती कर इस वर्ष ₹6.38 लाख की आय अर्जित की है।

वनमालिभाई का स्पष्ट मानना है कि रासायनिक खाद के बिना कुछ नहीं हो सकता, यह मानसिकता बिल्कुल गलत है। उन्होंने एक एकड़ से प्राकृतिक खेती की शुरुआत की थी और आज 10 बीघा में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उनके अनुसार रासायनिक दवाओं के उपयोग के कारण लोगों में बीमारियाँ बढ़ रही हैं और आकस्मिक मृत्यु दर भी बढ़ी है।

उन्होंने बताया कि मई 2018 में कुछ गुठ्ठों में घर के उपयोग हेतु सब्जियों की प्राकृतिक खेती से शुरुआत की थी। एक समय उनका परिवार भी इस खेती के विरोध में था।

उनका कहना है: “मेरा बेटा बार-बार कहता था, बापूजी, रासायनिक खाद के बिना कुछ नहीं उगेगा… यह सब क्यों कर रहे हैं? लेकिन मेरे मन में विश्वास था कि मुझे यह खेती करनी ही है और सफल भी होना है।”

वर्ष 2020 में मित्र भरतभाई की सलाह से उन्होंने प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों के अनुसार एक एकड़ में गन्ने का रोपण किया। जब फसल तैयार हुई तो एक एकड़ में 78 टन का रिकॉर्ड उत्पादन मिला। इसके लिए शुगर फेडरेशन ने उनका सम्मान भी किया। यही वह मोड़ था जब परिवार को भी प्राकृतिक खेती पर विश्वास हो गया।

अपने अनुभव साझा करते हुए वनमालिभाई बताते हैं कि शुरुआत में वे मित्र भरतभाई से जीवामृत और घनजीवामृत लाकर छिड़काव करते थे। परंतु 2021 में गन्ने की सफलता के बाद उन्होंने दो देसी गिर नस्ल की गायों की बछड़ियाँ लेकर पालन शुरू किया। आज वे इन दोनों गायों के गोबर और गोमूत्र से ही जीवामृत और अन्य दवाएं बनाकर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। लगभग 30 गुठ्ठों में वे परवल, हल्दी, मिर्ची, तुरई, गोभी, टमाटर और दूधी जैसी मिश्रित फसलों की मंडप आधारित खेती कर रहे हैं। मिर्च की फसल में गोबर की राख का छिड़काव करने से उन्हें अत्यंत अच्छे परिणाम मिले हैं।

उत्पादन और आय के बारे में वे बताते हैं कि 15 गुठ्ठों में बोई गई तुरई से ₹70,000 की, दूधी से ₹16,900 की आय हुई। अन्य 15 गुठ्ठों में बैंगन से ₹51,130, परवल से ₹92,800 तथा हरी हल्दी से ₹8,000 की आय हुई। इसके अलावा 6 बीघा में 122 टन गन्ने का उत्पादन प्राप्त हुआ, जिससे प्रति टन ₹3,271 के हिसाब से लगभग चार लाख रुपये की आय हुई। उनके खेत में रोज़ाना पाँच से छह मज़दूर काम कर रहे हैं और रोज़गार कमा रहे हैं।

सब्जियों में आने वाले रोगों के नियंत्रण के बारे में वे बताते हैं कि वे बासी छाछ और ‘गौकृपा अमृत’ का छिड़काव करते हैं, जिससे रोग नहीं आते। यदि रोग आ जाएँ तो ‘निमास्त्र’ का उपयोग करते हैं। उससे भी नियंत्रण न हो तो ‘अग्नि अस्त्र’ और अंत में ‘ब्रह्मास्त्र’ का उपयोग करते हैं, जिससे कीट पूरी तरह नियंत्रित हो जाते हैं।

सब्जियों के विक्रय के बारे में वे बताते हैं कि आसपास के गांवों के लोग उनके घर और खेत से ही सब्जियां खरीदने आते हैं। इसके अलावा पास के हाट बाजार में और शहर में सरकार द्वारा शुरू किए गए प्राकृतिक विक्रय केंद्र पर भी वे अपनी उपज का विक्रय करते हैं।

शुद्ध सात्त्विक भोजन के समर्थक और खेती में आधुनिक तकनीक के हिमायती वनमालिभाई का कहना है कि खेती को लाभकारी, टिकाऊ और स्वास्थ्यप्रद बनाने के लिए प्राकृतिक कृषि की ओर लौटना अत्यंत आवश्यक है। मेहनत भले थोड़ी अधिक हो, पर संतोष इस बात का है कि वे लोगों को शुद्ध भोजन उपलब्ध करा रहे हैं। आज रासायनिक खाद और रासायनिक दवाओं के कारण नागरिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं और बढ़ती बीमारियाँ इसका प्रमाण हैं। इसलिए किसानों को चाहिए कि वे कम से कम अपने घर की जरूरत के सब्जियों और अनाज की खेती प्राकृतिक पद्धति से शुरू करें।

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