धर्म- समाज

सात्विक स्नेह और प्रेम का पर्व है रक्षाबंधन

आज रक्षाबंधन है।भाई बहन कई दिनों से इस पर्व की प्रतीक्षा कर रहे थे।भारत वर्ष पर्व प्रधान है।इस देश मे कोई न कोई पर्व आता ही है।कुछ पर्व ऐसे है जो धर्म या जाति से बंधे नही होते है। उनका अपना सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व होता है।ऐसे पर्वो में रक्षा बंधन के पर्व का महत्वपूर्ण स्थान है।

प्रत्येक पर्व और त्योहार की पृष्ठभूमि में कोई न कोई घटना छिपी होती है। कुछ घटनाए अपने जीवंत संदेश के कारण इतनी महत्वपूर्ण होती है कि उन्हें चिरस्मरणीय और चिरस्थाई बनाने के लिए उन घटनाओ को पर्व और त्योहार का रूप दे दिया जाता है।

रक्षाबंधन त्योहार के पीछे जो घटनाक्रम है उसको लोग प्रायः भूल गए है। वैदिक और जैन परम्परा में त्योहारों से जुड़ी साम्य रूप है। वैदिक और जैन परम्परा एक ही है। कुछ अलग जरूर है। लेंकिन समानता है।

विष्णु याचक बनकर आये और वामन रूप विष्णु ने बलि से तीन पग जमीन मांगी।विष्णु ने दो पैरों से भूमण्डल और आकाश नाप लिये तो विष्णु ने पूछा-अब तीसरा पग कहा रखूं।बलि ने अपना सिर झुका दिया।बलि के सिर पर पांव रखकर भगवान विष्णु ने उसके अहंकार का ध्वंस किया।
राखी के धागों को एक दूसरे को बांधना है।

एक दूसरे को प्रेम और सहयोग करने का वचन लेना है। समाज का हर वर्ग एक दूसरे को स्नेह के बंधन में बांध लें तो जीवन मे निखार आ जायेगा। अभाव का अंत हो जाएगा।राखी का त्योहार सात्विक स्नेह और प्रेम का पर्व है।

एक दूसरे की रक्षा करने का पर्व है। शत्रुता का शमन कर मित्रता और भाई चारे को बढ़ाने वाला पर्व है।पर्व की गरिमा को बढ़ाने वाला पर्व है। पर्व की गरिमा को बढ़ाने के लिए हमको इस पर्व को मनाना चाहिए।भाई व बहन के प्यार में जो सात्विकता है ।वह अन्य संबंध में कहा परिलक्षित हो पाती है?

विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो की घटना क्या विश्व कभी भूल सकता है,जिसमे स्वामी विवेकानंद ने उस अंतराष्ट्रीय मंच पर अपने उदगार व्यक्त करने के पूर्व सभा को संबोधित करते हुए कहा -बहनों और भाइयों -सिस्टर एंड ब्रदर्स कहा था।इसके पहले अमेरिकावासी लेडीज एंड जेंटलमैन-महिला और पुरुषों का संबोधन ही सुनते थे।

पहली बार उन्होंने विवेकानंद से अपने लिए बहनों और भाइयों का संबोधन सूना तो भावातिरेक होकर गदगद हो गए।इन दो शब्दों को सुनकर सभाखण्ड करतल ध्वनि से गूंज उठा।भाई और बहन की महत्ता का प्रभाव दुनिया के अन्य देशों ने जाना।

आज हम सब इस त्योहार को मनाते है।महंगी महंगी रखिया खरीद कर बहने भाई को बांधती है।घरो में हम देखते है कि लोग हर वस्तु के राखी बांध कर उससे रक्षा की कामना करते है।बच्चे रास्ट्रपति भवन एवं प्रधानमंत्री भवन जाकर रास्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री को रक्षा सूत्र बांधकर उनसे राष्ट्र की रक्षा हेतु उचित निर्णय लेने की दुआ करते है।

रक्षा बंधन एक दूसरे की रक्षा की प्रेरणा देने वाला पर्व है।प्राणिमात्र की रक्षा करके उनके विकास में योगदान करने की याद दिलाने वाला पर्व है।विश्व बंधुत्व के भाव को जगाने वाला पर्व है।

रक्षाबंधन की व्यापकता

यह पर्व सारे समाज का पर्व है।समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने उत्तरदायित्वो का निर्वाह करे और संमाज़ की व्यवस्था को बनाये रखने हेतु सम्पन्न वर्ग अपने से विपन्न व्यक्ति का सहयोग करे।यही संदेश है रक्षाबंधन का।रक्षाबंधन के दिन ब्राह्मण, क्षत्रिय राजाओं के राखी बांधकर समाज की रक्षा का वचन लेते रहे है।

भारतीय जन मानस में रक्षाबंधन भाई और बहन के स्नेह का त्योहार है।बहन प्रतिवर्ष अपने भाई की कलाई में राखी बांधकर उसके सुखी और संपन्न बनने की मंगलकामना करती है।उसके बदले भाई अपनी तरफ से कुछ भेंट देकर बहन का सम्मान करता है।आज इसका रूप विस्तृत हो गया है आज रक्षासूत्र बांधकर कोई किसी को भी अपना भाई बहन बना सकता है।

समाज मे कितने ही स्त्री पुरुष राखी के पर्व की महत्ता का निर्वहन करते है।भारत के इतिहास में ऐसी घटनाएं है,जिन्होंने राखी के पर्व की महत्ता को बढ़ाया है।

हुमायूं का राखी प्रेम

मेवाड़ के राजा सांगा प्रथम मुग़ल सम्राट बाबर के शत्रु थे।1526 में बाबर और सांगा का युद्ध हुआ।बाबार की मृत्यु के बाद हुमायूं गद्दी पर बैठा।लेकिन शेरशाह सूरी ने हुमायूं को चैन से न बैठने दिया।हुमायू को हटाकर शासक बना।उधर हुमायू शेरशाह सूरी को हराने के लिए अपना सैन्यबल लिए जंगल मे पड़ाव डाले पड़ा था।यह सूरी से भयभीत था।

गुजरात के बादशाह बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया।राजपूत शक्ति छिन्न भिन्न थी।राणा सांगा मर चुके थे।उनकी विधवा रानी करमा बाई ने हुमायू को राखी भेजकर बहादुरशाह से रक्षा मांगने का मन बनाया तो राजपूत सरदारों ने रानी से कहा -महारानी हुमायू जनता है कि आप उनके पिता बाबर के शत्रु की रानी है।क्या वह आपकी रक्षा करने आएगा?रानी कर्मावती ने बड़े आत्म विश्वास के साथ कहा-हुमायू कर्मावती की रक्षा करने नही आएगा।लेकिन एक मुसलमान भाई अपनी हिन्दू बहन की रक्षा करने अवश्य आएगा।राखी व्रज से भी कठोर बंधन है।

हुमायू पिता की शत्रुता के बंधन को तोड़ देगा और उसे बहन की रक्षाबंधन में बांध देगा।राखी के साथ कर्मावती अपने भाई बहादुरशाह से रक्षा चाहती है।यह सुनते ही हुमायू भावुक हो उठा।हुमायू को मना करने के बाद भी उंन्होने कहा कि राखी का त्योहार हिन्दू मुसलमानों का त्योहार नही है।यह बहन की रक्षा का पवित्र बंधन है।धर्म की बहन सहोदर से बड़ी होती है।एक भाई अपने संकट को भूल कर पहले बहन की हिफाजत करता है।हुमायू और कर्मावती के राखी प्रेम और उसकी रक्षा की यह घटना इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखी है।


( कांतिलाल मांडोत )

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