पत्रकारिता का लक्ष्य लोकतंत्र और लोकतंत्रगामी को उन्नत बनाना

पत्रकारिता दिवस पर विशेष

कांतिलाल मांडोत
अखबारी दुनिया मे प्रतिदिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे और दबाव की चर्चा होती है। पत्रकारिता के स्वरूप को लोकतंत्रगामी बनाने की भी बहुत बहस होती है। पत्रकार कई प्रकार के खतरों का रोना तो रोते है,लेकिन इसके मुक्ति के मार्ग पर विचार नही करते। पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और इस पर बाजारीकरण के बढ़ते प्रभाव से सभी अनभिज्ञ है। सदियों से व्यक्ति, विचार,साधन और पूंजी में वर्चस्व की जंग चल रही है। पत्रकारिता में यदि मुनाफा ही ईश्वर हो जाएगा तो समाज मे विकृति को रोका नही जा सकता है। पत्रकार अपनी जान की बाजी लगाकर लोगो तक समाचार पहुंचाते है। हमारा लक्ष्य पैसा कमाना नही है।बल्कि पत्रकारिता के माध्यम से लोकतंत्र को मजबूत करना है।

पत्रकार के पास देशप्रेम और धैर्य शक्ति होनी चाहिए। हमे हर समय देश जेहन में रखना चाहिए। मजबूत संकल्प शक्ति और धैर्य के स्पष्टता होनी चाहिए। तभी हम अपनी राह पर आगे बढ़ सकते है। हथियार जब सिपाही के हाथ मे होता है तो वह सुरक्षा के लिए उपयोग होता है।किसी डकैत के हाथ में जब हथियार आ जाता है तो वह सुरक्षा को खतरा बन जाता है। हथियार नही हाथो का ही महत्व है। जहा तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है,इसको सबसे अधिक खतरा सरकारों का होता है। यह पत्रकारिता की प्रासंगिकता है की किसी भी विकट से विकट परिस्थितियों में भी अखबार को निकालने की पूरी कोशिश रहती है।

लोकतांत्रिक समाज मे पत्रकारिता को चौथा स्तम्भ माना जाता है। बिना किसी खास संवैधानिक अधिकारों और खासकर भारत जैसे देशों में सतत आर्थिक सुरक्षा के बावजूद अगर सच की आंख से किसी घटना को देखना संभव है तो उसका बड़ा और भरोसेमंद जरिया पत्रकारिता ही है। इस लिहाज से देखे तो पत्रकार को समाज का सरंक्षण हासिल होना चाहिए। पत्रकारों के व्यापक हितो के लिए संघर्ष की प्रतिबद्धता सूची में निचले पायदान पर चला गया है।

केंद्र और राज्य सरकारों को यह सोचना चाहिए कि अपने खतरों की परवाह किये बिना रात रात जग कर अखबार निकालना और लोगो के उठने के पूर्व अखबार पाठकों के दहलीज पर पहुँच जाता है।यह संघर्ष निरन्तर चलता ही रहता है। लोग रविवार को भी आराम करते है और पत्रकार रविवार को भी समाचार की खोज में घर से बाहर रहता है। यह हमेशा डर बना रहता है कि कोई मुख्य समाचार दूसरे अखबार में छप गया और हमारे से छपना बाकि रह गया।

देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को लेकर इस तरह का चलाऊ रवैया उचित नही है। देश मे आम आदमी को सरकार की तरफ से सहूलियत दी जाती रही है,लेकिन पत्रकार तो देश की सेवा करने के लिए आते है। उनको किसी से गिले शिकवे नही है। राज्य और केंद्र सरकार को कडक़ अभिगम अपनाना होगा। पत्रकार पर हमले भी होते रहे है। पत्रकार पर जानलेवा हमले होते है,लेकिन सरकारों के कान पर जु तक नही रेंगती है। आखिर देश की सेवा करते हुए सिपाही शहीद होते है तो उनके परिवार को मरणोपरांत याद किया जाता है। वो बंदूक के सिपाही है और पत्रकार कलम का सिपाही है।

कोरोना महामारी में सेवा देते हुए सैकड़ो पत्रकार ने अपनी जान गंवाई है। भारत में बढ़ते खतरों को लेकर अध्यन की परिपाटी टूट गई है। पहले पत्रकारों के संगठन करते थे।लेकिन ठेकेदारी की प्रथा के विकसित होने के बाद पत्रकारिता की दुनिया मे संगठन नाम मात्र के रह गए है। पïत्रकारिता के बदलाव का माध्यम और जनता की आवाज बनाने की कोशिश हमेशा पत्रकार के मन मे रहती है। आर्थिक संसाधनों की तंगी के कारण चेनल और अखबार के लिए टेडी खीर है।

हम पत्रकारिता को हर समय लोकतंत्रगामी बनाने का लक्ष्य रख कर आगे बढ़ते है।कोरोना काल मे अखबार और टेलीविजन पर प्रसार और विज्ञापन की कमी के कारण नकारात्मक बढ़ी है। बाजार में प्रतिस्पर्धा भी कम नही है।अखबार से जुड़े रहने वाले पत्रकार कई घटनाओं के साक्षी रहे है। लेकिन वो घटना सपने की तरह भूल कर आगे बढ़ते रहते है। कभी कभी शासन प्रशासन का दबाव भी झेलना पड़ता है। कई बार लालच भी दिए जाते है। लेकिन जो देशभक्त और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने वाले पत्रकार लालच को दरकिनार करते हुए अपने असूलों से समझौता नही करते है।

कई बार समाचार नही छापने के लिए ऑफर आती है,लेकिन यह ऑफर ठुकरा दी जाती है। एक पत्रकार की हैसियत एक सांसद या एक मंत्री से कम होती है? पत्रकारिता को सांसद और मंत्री की सीढ़ी बनाने के बजाय हर पत्रकार को अपने जीवन का लक्ष्य पत्रकारिता को लोकतंत्र गामी और लोकतंत्र को उन्नत बनाने का रखना चाहिए। जो पत्रकार अपने जीवन मे ऊंचाइयों को छूने के सपने देख रहे है पैसे कमाने के लिए पत्रकारिता कर रहे है तो यह गलत है। पैसे कमाने है तो बिजनेस में जाइये। यहां तो देशप्रेम,देशभक्ति और जनता की सेवा ही मुख्य लक्ष्य होता है।

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