टूटती सांस की आखिरी उम्मीद डॉक्टर

कांतिलाल मांडोत
डॉक्टर को नेक्स टू गॉड कहा गया है।जब इंसान हार मान लेता है। उस हताशा में भगवान के बाद डॉक्टर का ही भरोसा रहता है।मरीज डॉक्टर पर  भरोसा कर उनको अपना शरीर सौंप देते है।आज के परिप्रेक्ष्य में कोरोना महामारी के भयंकर प्रकोप के आगे दुनिया लाचार है। तब एक चिकित्सक पर आखिरी उम्मीद बची हुई थी।देश दुनिया में हाहाकार मचाने वाले कोरोना वायरस से लोग परेशान थे।इस समय डॉक्टर की अहमियत मरीज और उसके परिजन ही जान पाए   कि चिकित्सक प्राणदाता है।डॉक्टरों के प्रति समाज मे भ्रांतिया फैल गई है कि यह बिरादरी सेवा की भावना को त्याग कर व्यवसायिक मनोवृति वाली हो चुकी है।चिकित्सक और चिकित्सा जगत के प्रति दुष्प्रचार का यह अर्ध सत्य है और इसके दो पहलू है।आज भी अधिकांश डॉक्टर मरीजो की सेहत और जीवन को लेकर काफी संजीदा रहते है।गरीब लोगों को मुफ्त में चिकित्सा प्रदान करने वाले आज भी मौजूद है।
कोरोना महामारी के दौरान चिकित्सक ने  उस जो वफादारी दिखाई उसे कभी भुलाया नही जा सकता है।अपनी परवाह न करके मरीजो की जान बचाते समय सैकड़ो डॉक्टरो की मौत भी हुई है।ये चिकित्सा जगत के सैनिक है।जो खुद शहीद हो जाते हैं,लेकिंन जिस के भरोसे हम रहते है उसको आंच तक नही आने देते है।हजारो डॉक्टर संक्रमित हुए है।भारत जैसे देश में दो तिहाई आबादी के लिए एक मात्र विकल्प है।फलस्वरूप यहां मरीज़ों का काफी दबाव रहता है। डॉक्टरी पेशा ही ऐसा पेशा है जिसकी सर्वोच्च सामाजिक प्रतिष्ठा है और लोग सबसे ज्यादा विश्वास डॉक्टर पर करते है।डॉक्टर को धरती का भगवान माना गया है।डॉक्टरों के पुनीत व मानवीय के दृष्टिगत कहा भी गया है कि चिकित्सा से पुण्यपद कोई  दूसरा कार्य नही है।भारत में पौराणिक काल से लेकर आधुनिक सभ्यता तक वेदों हकीमो और डॉक्टरों का सम्मानजनक स्थान है।विडम्बना है कि नैतिक मूल्यों के क्षरण के आज के दौर में अब चिकित्सको के सामाजिक और व्यवसायिक प्रतिष्ठा पर भी आंचआने लगी है।डॉक्टर और मरीज के बीच पहले जैसा  विश्वास नही रहा जो इस पेशे की अहम कड़ी है,फलस्वरूप कई बार मरीजों के परिजनों और डॉक्टरों के बीच हिंसक संघर्ष की वारदातें हो रही है।यह असभ्य लोगो की निशानी है।मरीज को बचाने के लिए डॉक्टरों कभी निराश नही होता है।
बहरहाल इस बात से  भी इंकार नही किया जा सकता कि बाजारवाद और उपभोक्तावाद के इस दौर में डॉक्टरी पेशे की गरिमा में भी आंच आई है।दरअसल,डॉक्टर और मरीज का संबंध परस्पर सम्मान,भरोसे और भावनाओं से बंधा होता है।लेकिन हाल के वर्षों में काफी गिरावट आई है,इसके लिए समाज और चिकित्सक दोनों जिम्मेदार है।देश मे चिकित्सा सेवाओ के बढ़ते निजीकरण और स्वास्थ्य सेवाओं के खस्ताहाल स्थिति ने चिकित्सा पद्धति की विश्वसनीयताऔर प्रतिष्ठा को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है।लोगो मे यह धारणा बन चुकी है कि निजी डॉक्टर अपने नर्सिंग होम का भारी भरकम खर्च जुटाने तथा मोटा मुनाफा कमाने के लिए मरीजो का  गैर जरूरी टेस्ट कराते है।कोरोना के दौर में भी ऐसी खबरें सामने आई।दरअसल, डॉक्टरी जैसा पेशा बदनाम हो रहा है।चिकित्सा संगठनों को ऐसे अनैतिक गतिविधियों के खिलाफ संज्ञान लेने की जरूरत है।हालांकि चिकित्सा बिरादरी में जारी इस गोरखधंधे के विरुद्ध कुछ डॉक्टर भी आवाज उठाने लगे है तथा इस अनैतिकता से लड़ रहे है।
देश मे फैले झोलाछाप डॉक्टरों की वजह से चिकित्सक समाज को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।पांचवी कक्षा पास डॉक्टर बने हुए है।गांवो में इन झोलाछाप डॉक्टरों का इलाज चलता है।जिससे लोगो को डॉक्टरों के प्रति नफरत हो जाती है।सरकार ऐसे झोलाछाप के खिलाफ कार्रवाई नही करती है।जिससे उनके हौसले बुलंद है।आख़िर डॉक्टर भी समाज का ही हिस्सा है।उनकी भी पारिवारिक और समाजिक जिम्मेदारियां है।आज के भौतिकवादी युग में डॉक्टरों को भी आर्थिक जरूरत रहती है।समाज की भी जिम्मेदारी है कि वे चिकित्सकों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाए, क्योकि  ईश्वर हमे जन्म देता है लेकिन गंभीर बीमारीयो और दुर्घटनाओं में जीवन तो डॉक्टर ही देता है।

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