अक्षय तृतीया का शुभ संयोग: अदभुत मुहूर्त में सूरत में सैकड़ों विवाह, नए सौर वर्ष के साथ मांगलिक कार्यों की शुरुआत
सूरत। सूर्य देव के मेष राशि में प्रवेश के साथ ही धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण समय की शुरुआत हो गई है। मंगलवार को दोपहर 11:25 बजे सूर्य ने मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश किया, जिसे मेष संक्रांति कहा जाता है। इस गोचर के साथ ही एक माह से चल रहा खरमास समाप्त हो गया और विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्य पुनः प्रारंभ हो गए हैं।
अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर इस बार अदभुत मुहूर्त का विशेष संयोग बन रहा है, जिसके चलते सूरत शहर में सैकड़ों शादियां आयोजित होने जा रही हैं। बिना किसी विशेष मुहूर्त देखे विवाह संपन्न करने की परंपरा के कारण इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन प्राप्त आशीर्वाद अत्यंत तीव्र और अक्षय फल देने वाले होते हैं, इसलिए इस तिथि पर किए गए सभी शुभ कार्य स्थायी और फलदायी माने जाते हैं।
नए सौर वर्ष का शुभारंभ, मेषार्क कुंडली का विशेष प्रभाव
ज्योतिषाचार्य गोविंद मुंदड़ा के अनुसार, इस वर्ष मेष संक्रांति वृषभ लग्न और कुंभ राशि में घटित हो रही है, जिससे एक विशेष मेषार्क कुंडली का निर्माण हुआ है। भचक्र की पहली राशि मेष में सूर्य का प्रवेश नए सौर वर्ष का प्रतीक माना जाता है, जो ऊर्जा, उत्साह और नई शुरुआत का संकेत देता है।
6 राशियों के लिए रहेगा विशेष लाभकारी वर्ष
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, यह सौर वर्ष मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, तुला और वृश्चिक राशि के जातकों के लिए विशेष रूप से शुभ और प्रगतिकारक रहेगा। इन राशियों के लोगों को करियर, व्यापार, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि के योग बन रहे हैं।
राजनीतिक और आर्थिक संकेत भी महत्वपूर्ण
मेषार्क कुंडली के अनुसार, जहां एक ओर व्यक्तिगत स्तर पर उन्नति के संकेत हैं, वहीं दूसरी ओर देश के राजनीतिक परिदृश्य में सत्ता पक्ष को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही आम जनता पर महंगाई का दबाव बढ़ने के भी संकेत मिल रहे हैं।
अक्षय तृतीया का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व
भविष्य पुराण के अनुसार, अक्षय तृतीया को युगादि तिथि कहा गया है। मान्यता है कि सतयुग, त्रेतायुग और कलयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ, जबकि द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। इस कारण यह तिथि सृष्टि के कालचक्र में अत्यंत विशेष मानी जाती है।
धार्मिक दृष्टि से भी इस दिन का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है, क्योंकि चारों धामों में प्रमुख भगवान श्री बद्रीनारायण धाम के कपाट इसी दिन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। वहीं वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मंदिर में वर्ष में केवल एक बार अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान के चरणों के दर्शन का विशेष अवसर प्राप्त होता है, जो भक्तों के लिए अत्यंत दुर्लभ और पुण्यकारी माना जाता है।
शास्त्रों में भी इस तिथि की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है
“न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गंगयां समम्।“
अर्थात वैशाख मास के समान कोई महीना नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं, वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। उसी प्रकार अक्षय तृतीया के समान कोई अन्य तिथि नहीं मानी गई है।
विवाह के 44 शुभ मुहूर्त, चातुर्मास में रहेगा विराम
अप्रैल से दिसंबर 2026 के बीच विवाह के कुल 44 शुभ मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे। हालांकि, 12 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाएंगे, जिसके कारण अगस्त से अक्टूबर तक चातुर्मास के दौरान सभी मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा।
शहर में बढ़ी रौनक, घर-घर में धार्मिक आयोजन
मंगलवार शाम से ही सूरत शहर में धार्मिक अनुष्ठानों का दौर शुरू हो गया है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और घरों में शुभ कार्यों की तैयारियां जोरों पर हैं। बुधवार से विवाह समारोहों की धूम के साथ शहर में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिल रहा है।
अक्षय तृतीया और मेष संक्रांति का यह पावन संगम न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करता है, बल्कि समाज और परिवार में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और उल्लास का संचार भी करता है।

( गोविंद मुंदड़ा, ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ )



