धर्म- समाज

अक्षय तृतीया: एक दिन जो बदल सकता है आपकी किस्मत , बिना मुहूर्त हर कार्य में सफलता और अटूट धन का दिव्य संयोग !

अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में स्थायी समृद्धि, शुभ आरंभ और अनंत पुण्य प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर है। इस दिन किया गया हर शुभ कार्य अक्षय फल देता है अर्थात उसका प्रभाव कभी समाप्त नहीं होता।

अक्षय तृतीया हिंदू धर्म की सबसे शुभ, पवित्र और स्वयं सिद्ध तिथियों में से एक मानी जाती है

“अक्षय” का अर्थ है जो कभी क्षय न हो। इसलिए इस दिन किए गए दान, जप, तप, पूजन, निवेश और शुभ कार्यों का फल निरंतर बढ़ता रहता है। यही कारण है कि इस दिन विवाह, गृहप्रवेश, नया व्यवसाय, भूमि पूजन या किसी भी महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत बिना मुहूर्त देखे की जा सकती है।

 यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है

वर्ष विशेष में यह तिथि 18 अप्रैल शाम 5:31 बजे से प्रारंभ होकर 19 अप्रैल दोपहर 2:12 बजे तक रहेगी, जबकि पर्व 19 अप्रैल को मनाया जाएगा। ज्योतिष के अनुसार इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी उच्च स्थिति में रहते हैं, जिससे अत्यंत शुभ और प्रभावशाली योग का निर्माण होता है। यही कारण है कि इसे “सर्वसिद्ध मुहूर्त” कहा जाता है।

इस वर्ष बन रहे विशेष राजयोग

अक्षय तृतीया पर इस बार कई शुभ योगों का दुर्लभ संयोग बन रहा है सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग, गजकेसरी योग और धन योग जैसे प्रभावशाली योग इस दिन को और अधिक फलदायी बना रहे हैं। ये योग जीवन में सफलता, धन वृद्धि, प्रतिष्ठा और स्थायी उन्नति के संकेत देते हैं। विशेष रूप से सूर्य और चंद्रमा की उच्च स्थिति इस दिन को अत्यंत शक्तिशाली बना रही है।

पौराणिक दृष्टि से भी अक्षय तृतीया अनेक दिव्य घटनाओं का संगम है

इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्म हुआ, इसलिए इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। माता अन्नपूर्णा का अवतरण, मां गंगा का पृथ्वी पर आगमन और महाभारत के लेखन का प्रारंभ भी इसी दिन से जुड़ा हुआ है।

महाभारत काल की मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन भगवान गणेश से महाभारत लिखवाना प्रारंभ किया। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की कथा भी इस दिन को विशेष बनाती है, जब सुदामा की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें अक्षय समृद्धि का आशीर्वाद दिया। जैन धर्म में भी यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने इसी दिन अपने वर्ष भर के तप का पारण किया था।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह दिन धन और वैभव प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर माना जाता है

मान्यता है कि इसी दिन कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष बनाया गया था। इसलिए इस दिन सोना-चांदी, आभूषण, भूमि, भवन या वाहन की खरीदारी विशेष शुभ मानी जाती है। इस दिन किया गया निवेश भविष्य में कई गुना बढ़कर फल देता है।

धार्मिक दृष्टि से इस दिन पूजा-अर्चना और दान का विशेष महत्व है। प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और श्री गणेश की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। चंदन, पुष्प, धूप-दीप अर्पित कर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण को चंदन अर्पित करने की परंपरा भी इस दिन विशेष रूप से प्रचलित है।

दान-पुण्य इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण अंग है

जलदान, अन्नदान, वस्त्रदान और जरूरतमंदों की सहायता करना अक्षय पुण्य प्रदान करता है। विशेष रूप से गर्मी के मौसम में प्यासे लोगों को पानी पिलाना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यह पर्व हमें केवल व्यक्तिगत समृद्धि ही नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा और मानवता का भी संदेश देता है।

सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से भी अक्षय तृतीया अत्यंत महत्वपूर्ण है

इस दिन लोग नए व्यवसाय की शुरुआत करते हैं, नए घर में प्रवेश करते हैं और परिवार के साथ मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं। यह दिन नई ऊर्जा, सकारात्मक सोच और स्थायी सफलता का प्रतीक है।अक्षय तृतीया हमें यह सिखाती है कि सच्ची समृद्धि केवल धन में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों, सेवा, दान और सकारात्मक विचारों में निहित है। यदि इस दिन सच्चे मन से कोई भी शुभ कार्य आरंभ किया जाए, तो वह जीवनभर उन्नति और सुख-समृद्धि का आधार बनता है।

( गोविंद मूंदड़ा , ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ )

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