जब साल में जुड़ता है एक अतिरिक्त अध्याय: अधिकमास 2026 और जीवन को संतुलित करने का दिव्य अवसर
वर्ष 2026 हिंदू पंचांग के अनुसार एक अनोखा और विशेष महत्व वाला वर्ष है। इस बार ज्येष्ठ मास 2 मई से 29 जून तक कुल 59 दिनों का रहेगा, जो सामान्य अवधि से लगभग दोगुना है। इसका मुख्य कारण है बीच में आने वाला अधिकमास (पुरुषोत्तम मास), जो 17 मई से 15 जून 2026 तक प्रभावी रहेगा। इस अतिरिक्त मास के कारण वर्ष में 12 के स्थान पर 13 महीने हो जाते हैं। ज्येष्ठ मास की संरचना भी इस बार अलग है पहले 15 दिन सामान्य, फिर 30 दिन अधिकमास और अंत में फिर 15 दिन सामान्य। इस कारण व्रत-त्योहारों की तिथियों में बदलाव आता है और यह पूरा समय धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।
अधिकमास केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक सटीक खगोलीय और गणितीय संतुलन का परिणाम है। सौर वर्ष (365 दिन 6 घंटे) और चंद्र वर्ष (354 दिन) के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। यही अंतर लगभग तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाता है, जिसे संतुलित करने के लिए अधिकमास जोड़ा जाता है। यह लगभग 32 माह 16 दिन 8 घंटे के अंतराल पर आता है, जो भारतीय समय गणना की गहराई को दर्शाता है।
इस मास को अधिकमास, मलमास और पुरुषोत्तम मास—तीनों नामों से जाना जाता है। ‘मलमास’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दौरान विवाह, सगाई, गृहप्रवेश, नामकरण, मुंडन, यज्ञोपवीत, नया व्यवसाय या संपत्ति खरीद जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। किंतु पौराणिक कथा के अनुसार जब इस मास को कोई देवता स्वीकार नहीं कर रहा था, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ देकर सर्वोच्च बना दिया। उन्होंने यह वरदान दिया कि इस मास में किए गए जप, तप, दान और भक्ति का फल कई गुना, यहां तक कि 10 गुना अधिक मिलता है।
पौराणिक दृष्टि से इसका संबंध हिरण्यकश्यप और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से भी जोड़ा जाता है। हिरण्यकश्यप ने ऐसा वरदान लिया था कि उसकी मृत्यु लगभग असंभव हो गई थी न दिन में, न रात में; न घर में, न बाहर; न अस्त्र-शस्त्र से; न मनुष्य, न पशु द्वारा। तब भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर संध्या समय, देहरी पर, अपने नखों से उसका वध किया। यह घटना यह संकेत देती है कि जब संतुलन बिगड़ता है, तब ईश्वरीय शक्ति उसे पुनः स्थापित करती है।
धार्मिक रूप से अधिकमास को आत्मशुद्धि, संयम और साधना का सर्वोत्तम समय माना गया है। इस दौरान व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, ध्यान, जप, योग, भजन-कीर्तन और सत्संग का विशेष महत्व होता है। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप अत्यंत फलदायी माना गया है। साथ ही श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता, विष्णु पुराण, देवीभागवत जैसे ग्रंथों का पाठ-श्रवण भी लाभकारी होता है। मान्यता है कि इस समय की गई साधना से मानसिक शांति, पापों का क्षय और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
इस मास में दान-पुण्य और सेवा कार्यों का विशेष महत्व है। दीपदान, अन्नदान, जलदान, वस्त्रदान, गौसेवा और जरूरतमंदों की सहायता करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। ज्येष्ठ की गर्मी को देखते हुए जल सेवा प्याऊ लगाना, राहगीरों को पानी पिलाना, पशु-पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था करना, पौधों को सींचना और जल संरक्षण करना सबसे बड़ा धर्म माना गया है।
इस अवधि में गंगा दशहरा, निर्जला एकादशी, वट सावित्री व्रत, शनि जयंती और बड़ा मंगल (हनुमान जी की पूजा) जैसे महत्वपूर्ण पर्व आते हैं। मान्यता है कि इसी माह में हनुमान जी की पहली भेंट भगवान श्रीराम से हुई थी, इसलिए इस समय हनुमान साधना और मंगलवार के व्रत भी विशेष फलदायी होते हैं।
वहीं, इस मास में कुछ कार्यों को टालना चाहिए। विशेष रूप से विवाह, सगाई, गृहप्रवेश, नामकरण, मुंडन, नया व्यवसाय जैसे मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए। साथ ही तामसिक भोजन, अत्यधिक मसालेदार भोजन, दिन में सोना, जल की बर्बादी और बैंगन का सेवन करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार परिवार के बड़े पुत्र या पुत्री का विवाह इस अवधि में नहीं करना चाहिए।
ज्योतिषीय दृष्टि से ज्येष्ठ मास के स्वामी मंगल ग्रह हैं, जो ऊर्जा और साहस के प्रतीक हैं। इस मास की पूर्णिमा ज्येष्ठा नक्षत्र में होती है। यह समय ग्रह दोषों की शांति, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
अंततः, अधिकमास केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि जीवन को समझने, संतुलित करने और आत्मिक उन्नति का एक अवसर है। यह हमें सिखाता है कि व्यस्त जीवन में भी थोड़ा रुककर आत्मचिंतन, सेवा, संयम और भक्ति को अपनाना कितना आवश्यक है। यही कारण है कि इसे भगवान विष्णु का प्रिय “पुरुषोत्तम मास” कहा जाता है एक ऐसा समय, जो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

गोविंद मूंदड़ा ( ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ )


