
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर हार्वर्ड में मोरारी बापू की 982वीं रामकथा का दिव्य शुभारंभ
अहमदाबाद (गुजरात) [भारत] : भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अमेरिका में आध्यात्मिक यात्रा के एक अविस्मरणीय पड़ाव के रूप में रामकथा का दिव्य शुभारंभ हुआ। ऐतिहासिक विश्वविद्यालय की इस आध्यात्मिक यात्रा में बड़ी संख्या में कथाकार, साहित्यकार, विद्वान और विचारक शामिल हुए। हार्वर्ड में हार्डवर्क और हार्टवर्क के विश्वविद्यालयों का मानो संगम हुआ!
अपने तिरस्कार को पकड़कर उसका संरक्षण करने वाली मनःस्थिति ग्रंथि है, जबकि उससे स्वीकार की ओर जाने का खुला मार्ग बनाने वाला ग्रंथ है। “मेरा कोई मिशन नहीं है, बल्कि एक मधुर मनोरथ है कि हृदय विचारक बने और बुद्धि गुणातीत हो जाए।”
जब तक शब्द कर्म का रूप नहीं लेता, तब तक बात नहीं बनती। यह सेवनीय शास्त्र है। लौकिक-अलौकिक को छोड़कर मौलिक हो जाना बहुत अच्छा रहेगा।
भारतीय धर्म जगत के लिए गौरवपूर्ण दिन, भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस—15 अगस्त—का वह अवसर, जब मोरारी बापू की आध्यात्मिक यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सैंडर्स थिएटर मेमोरियल हॉल, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका में बापू की रामकथा की चौपाइयां तल्गाजरड़ा व्यासपीठ से गूंज उठीं।
बीज पंक्ति:
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा;
कहिअ न आपन जान अकाजा
-बालकांड-164
मख रखवारी करि दुइहु भाई;
गुरु प्रसाद सब विद्या पाई
-बालकांड-357
सहित समाज तुम्हार हमारा;
घर बन गुरु प्रसाद रखवारा
-अयोध्या कांड-306
अमेरिका में 15 अगस्त की शाम से मोरारी बापू की 982वीं रामकथा का गरिमापूर्ण शुभारंभ हुआ। आरंभ में दीप प्रज्वलन और वेद के घनपाठ की विधि के बाद स्थानीय आयोजकों तथा मनोरथी लॉर्ड डॉलर पोपट द्वारा स्वागत समारोह किया गया। भारत से पधारे संत-महंतों और कथा वाचकों के साथ हार्वर्ड के ऐतिहासिक सभागार में स्कॉलर की भव्य बैठक व्यवस्था वाली बेंचों पर श्रोताओं ने स्थान ग्रहण किया। तब विश्वविख्यात विंटेज हेरिटेज जैसे सैंडर्स हॉल में हार्वर्ड के हार्डवर्क और हार्टवर्क (बापू) विश्वविद्यालयों का मानो संगम हुआ!
परमात्मा की असीम कृपा से इस विश्वविद्यालय के प्रांगण में श्रावण मास में रामकथा का शुभारंभ हुआ। यहां उपस्थित कथाकारों, साहित्यकारों और विचार जगत के मनीषियों के सामने बापू ने कहा कि आज राष्ट्र और विश्व को साधु भाषा की आवश्यकता है।
पावन पोपट, डॉलर पोपट, संध्या बहन, रुपिन और शिवांग—पूरे परिवार ने मिलकर गजब नहीं, बल्कि अजब काम किया है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हार्डवर्क और हार्टवर्क के कारण यह संभव हुआ है।
विश्वविद्यालय की ओर से एक सदस्य व्यवस्था के लिए तल्गाजरड़ा आमंत्रण लेकर आए थे। उनकी बात करते हुए आनंदपूर्ण सद्भाव, स्वागत और सम्मान के लिए बापू ने धन्यवाद व्यक्त किया। यह होना था, इसलिए हो रहा है। यह ऐतिहासिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुष्ठान होने जा रहा है।
जब सुबह गुजरात से आए सुभाष भट्ट, नेहल गढ़वी और जय वसावडा ने सनातन मंदिर में प्रवचन किया, तभी मानो मंगलाचरण हो गया। ऐसा कहते हुए बापू ने कहा कि लौकिक-अलौकिक को छोड़कर जो मौलिक हो जाए, वह बहुत अच्छा रहेगा। यहां अनेक गुरु हुए होंगे, कई राजनेता, नोबेल पुरस्कार विजेता और उद्योगपति भी यहां पढ़े होंगे।रामचरितमानस में अलग-अलग 33 बार ‘प्रसाद’ शब्द आया है, जिसमें तीन बार ‘गुरुप्रसाद’ शब्द का उल्लेख है। इसी पर संवाद करेंगे। विश्व को भी संवाद की आवश्यकता है।
मानस में ज्ञान, भक्ति, कर्म और उपासना के घाट पर संवाद हुए हैं।
विश्वविद्यालय में रामकथा? स्वाभाविक प्रश्न है। लेकिन साहित्य इसे महाकाव्य कहता है, तो यह विश्वविद्यालय में हो और गोस्वामीजी इसे केवल महाकाव्य नहीं, बल्कि महामंत्र कहते हैं। ग्रंथ, ग्रंथि से मुक्त है। यह केवल ग्रंथ नहीं, सद्ग्रंथ है, त्रिभुवनीय विचार है, वैश्विक विचार है। हम इसका पूजन करते हैं, सेवन नहीं करते। शब्द जब तक कर्म नहीं बनता, तब तक बात नहीं बनती। यह सेवनीय शास्त्र है। सत्य-प्रेम-करुणा मानस की प्रस्थानत्रयी है। अपने तिरस्कार को पकड़कर उसका संरक्षण करने वाली मनःस्थिति ग्रंथि है, जबकि उससे स्वीकार की ओर जाने का खुला मार्ग बनाने वाला ग्रंथ है। इसका माहात्म्य और महिमागान तो है ही, लेकिन वक्ता ग्रंथ का परिचय भी कराते हैं।
हमें पूर्वाग्रह की ग्रंथि, हीनग्रंथि और लघुताग्रंथि से परिचय है।
सम्राट अशोक की पांच पत्नियां थीं। तीसरी पत्नी का नाम पद्मावती और पांचवीं पत्नी का नाम तिष्यरक्षिता था—जो तिरस्कार का संरक्षण करती है, वह। पद्मावती का एक पुत्र था, जिसका नाम कुणाल था। जिसकी आंखें बहुत सुंदर हों, उसे कुणाल कहते हैं। वह युवा था। पांचवीं माता भी बहुत सुंदर थी और कुणाल की ओर आकर्षित होकर कहती है कि तुम्हारी आंखें बहुत सुंदर हैं। वशीभूत राजा ने यह देखकर कुणाल की आंखें फुड़वा दीं। इसके बाद तिष्यरक्षिता को भी मार दिया गया। यह वृत्ति मरनी ही चाहिए। कुणाल को भगवान बुद्ध के पास ले जाया गया। भगवान बुद्ध की करुणामयी दृष्टि, जैसे बारह मेघों की तरह गुरु की बारह कृपाएं होती हैं, बुद्ध की दृष्टि से कुणाल को दिखाई देने लगा—ऐसी कथा है।
यहां सात सोपान हैं। पहले सोपान के सात मंत्रों के बाद लोकभाषा में पांच सोरठों में तुलसी ने पांच देवताओं की वंदना की। शंकराचार्य ने विचार का सेतुबंध किया, उसके बाद गुरु वंदना हुई। बापू ने कहा कि मेरा कोई मिशन नहीं है, बल्कि एक मधुर मनोरथ है कि हृदय विचारक बने और बुद्धि गुणातीत हो जाए।
गुरु पदकंज के असंग चरणों में वंदन। ऐसे गुरु में पांचों देव समाहित हो जाते हैं। इसके बाद रामायण के पात्रों, मातृरूपा कौशल्या आदि रानियों के साथ-साथ दुर्जनों और असुरों सहित सभी की वंदना की गई और अंत में परिवार के सदस्य जैसे हनुमानजी की वंदना के साथ आज की कथा का विराम हुआ।
कथा विशेष:
यह रामकथा रूपी आध्यात्मिक यात्रा कई मायनों में विशिष्ट है।
बापू की यह कथा, कथा क्रम की 982वीं रामकथा है।
इस कथा के मनोरथी अमेरिका स्थित लॉर्ड डॉलर पोपट परिवार है।
शुभ संयोग यह है कि इस रामकथा का गायन विश्वप्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के परिसर से भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शुरू हो रहा है।
अमेरिका की धरती पर मोरारी बापू इससे पहले 39 बार कथागान कर चुके हैं। इस कथा के साथ अमेरिका में 40वीं बार व्यासपीठ मुखर हो रही है।
इस कथागान के दौरान पहली बार विदेश की धरती पर तुलसी जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
श्रावण सुद सातम—19 अगस्त को तुलसी जयंती के अवसर पर बापू अमेरिका में भारत के करीब 50 कथाकारों को भी साथ लेकर गए हैं।
साथ ही गुजराती रचनाकार, लेखक, कवि, कलाकार तथा अपने-अपने क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां भी इस उत्सव में शामिल हुई हैं।
उल्लेखनीय है कि 2010 से तुलसी जन्मोत्सव के सार्वजनिक आयोजन की शुरुआत हुई थी। कलियुग के पावन अवतार तुलसीदास महाराज की पुण्य स्मृति के रूप में बापू ने कैलाश गुरुकुल-महुवा से तुलसी जयंती के अवसर पर भारत के विभिन्न प्रांतों के रामकथा गायकों, कथावाचकों, रामचरितमानस के चिंतकों तथा रामकथा के संदर्भ में योगदान देने वाली संस्थाओं में से किसी एक का चयन कर उनके विशिष्ट योगदान के लिए तुलसी पुरस्कार से सम्मानित करने की परंपरा शुरू की थी। इसके बाद तुलसी पुरस्कार के साथ-साथ व्यास पुरस्कार और वाल्मीकि पुरस्कार भी शामिल होते गए।
2010 से 2024 तक हर वर्ष महुवा गुरुकुल में इस कार्यक्रम का आयोजन होता रहा। पिछले वर्ष यह कार्यक्रम तुलसीदासजी के जन्मस्थान राजापुर में आयोजित किया गया था।
इस बार पहली बार विदेश की धरती—अमेरिका में यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, वह भी विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय के परिसर में। इस रामकथा का विषय भी बापू ने पहले ही घोषित करते हुए ‘मानस गुरु प्रसाद’ के रूप में कथागान करने की बात कही है। साथ ही कथा के दौरान शाम की सभा में प्रतिदिन विद्वान वक्ताओं के व्याख्यान भी आयोजित किए जाएंगे।



