
जन्माष्टमी पर 15 साल बाद विशेष संयोग, ज्योतिषीय दृष्टि से खास रहेगा पर्व, जानें
इस वर्ष 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाने वाली श्रीकृष्ण जन्माष्टमी धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष मानी जा रही है। ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ गोविंद मूंदड़ा के अनुसार करीब 15 वर्षों बाद जन्माष्टमी के अवसर पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2:25 बजे से 5 सितंबर रात 12:13 बजे तक रहेगी, जबकि रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को रात 12:29 बजे से रात 11:04 बजे तक रहेगा। श्रीकृष्ण जन्म की धार्मिक परंपरा में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी, मध्यरात्रि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व माना गया है। इसी कारण इस बार की जन्माष्टमी को विशेष अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
जन्माष्टमी का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण मध्यरात्रि का जन्मोत्सव होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ था, इसलिए निशीथ काल में मंदिरों और घरों में शंख-घंटानाद, जयकारों और भक्ति के बीच बाल गोपाल का अभिषेक, श्रृंगार, आरती एवं जन्मोत्सव किया जाता है। जन्म के बाद बाल कृष्ण को पालने में झुलाने की परंपरा भक्त और भगवान के बीच ममता एवं वात्सल्य का भाव दर्शाती है। माखन-मिश्री का भोग बाल कृष्ण की गोकुल की बाल लीलाओं की याद दिलाता है, जबकि तुलसीदल अर्पित करने की परंपरा भगवान विष्णु के कृष्ण स्वरूप की पूजा में विशेष मानी जाती है। श्रीकृष्ण के मुकुट का मोरपंख प्रकृति, सौंदर्य, आनंद और अहंकाररहित जीवन का प्रतीक माना जाता है।
जन्माष्टमी से जुड़ी एक रोचक विशेषता यह भी है कि श्रीकृष्ण जन्म का वर्णन अष्टमी तिथि, मध्यरात्रि और रोहिणी नक्षत्र के विशेष संदर्भ में मिलता है। ज्योतिष परंपरा में रोहिणी नक्षत्र का संबंध चंद्रमा से माना जाता है तथा इसे आकर्षण, सौंदर्य, सृजन और समृद्धि से जुड़ा नक्षत्र माना गया है। इसी वजह से जन्माष्टमी के आसपास रोहिणी नक्षत्र की स्थिति को श्रद्धालु विशेष महत्व देते हैं। जन्माष्टमी का व्रत भी केवल अन्न त्यागने तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि मन, वाणी और कर्म में संयम रखते हुए भगवान की भक्ति में मन लगाने का माध्यम माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार निराहार या फलाहार व्रत रखते हैं।
देशभर में जन्माष्टमी अलग-अलग रंग और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। मथुरा-वृंदावन में भव्य जन्मोत्सव, झांकियां और रासलीला, महाराष्ट्र में दही-हांडी तथा गुजरात सहित विभिन्न क्षेत्रों में भजन-कीर्तन, मटकी फोड़, सांस्कृतिक कार्यक्रम और आकर्षक झांकियां प्रमुख आकर्षण रहती हैं। आधी रात को शंख और घंटे बजाने की परंपरा श्रीकृष्ण जन्म के आनंद और विजय के प्रतीक के रूप में निभाई जाती है। इस प्रकार जन्माष्टमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्ति, संगीत, कला, लोकपरंपरा और सामाजिक उत्सव का भी पर्व है।
गोविंद मूंदड़ा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जीवन धर्म के साथ कर्म, नीति के साथ साहस और प्रेम के साथ जीवन-संतुलन का संदेश देता है। जन्माष्टमी का पर्व इसी संदेश को स्मरण करने और अपने जीवन में उतारने का अवसर है। इस बार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग पर्व की धार्मिक एवं ज्योतिषीय चर्चा को और महत्वपूर्ण बना रहा है। श्रद्धालुओं के लिए यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साथ उनकी शिक्षाओं, आदर्शों और जीवन-दर्शन को आत्मसात करने का भी अवसर है।

( गोविंद मूंदड़ा , ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ )



