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मदर्स डे : बालक को ऊर्ध्वगति प्रदान करने वाला होता है माँ का आशीर्वाद

भारतीय संस्कृति में माँ का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है।माता अपनी संतान के लिए अनेकों कष्ट सह कर उनका लालन पालन करती है। इस धरती को भी माँ की उपमा देते हुए कहा गया है कि धरती मेरी माँ है और मैं उसका पुत्र हूँ।अपनी संतान के लिए जितने कष्ट माँ सहन करती है उतने कष्ट और कोई सहन नही करता है। संतान का भी कर्तव्य है कि वह अपनी माँ की प्रसन्नता के लिए अपने कष्टो की परवाह नही करे।माँ जिस तन्मयता के साथ अपनी संतान को सुखी बनाने का प्रयत्न करती है। उसी प्रकार संतान को भी चाहिए कि उसी तन्मयता के साथ माँ की सेवा करे।उसके विचारों का सम्मान करें। माँ का आशीर्वाद बालक के जीवन को ऊर्ध्व गति प्रदान करने वाला होता है।

नारी नारी मत कहो,नारी नर की खान

नारी के संबंध में अपमान जनक टिप्पणी करने वाले भूल जाते है कि उनका जन्म भी किसी नारी की कोख से ही हुआ है। यदि नारी नही होती तो यह संसार चक्र चल पाता।नारी का व्यक्तित्व गरिमामय है। उसका बहुआयामी व्यक्तित्व पूजनीय है।उसके त्याग और बलिदान की गाथाएं बहुप्रचलित है। उसे अपमानित करना स्वयं का अपमान करना है। नारी की त्याग और बलिदान की बात आते ही हमे पन्ना धाय का स्मरण हो जाता है। जिसे अपने राज्य के उत्तराधिकारी अपने राजा के पुत्र की रक्षार्थ अपने पुत्र का बलिदान कर दिया था।क्या यह त्याग,बलिदान उसकी उदारता का अनुपम उदाहरण नही है?विश्व इतिहास में ऐसा उदाहरण खोजने पर भी नही मिलेगा।

नारी का मातृत्व गुण

माता के रूप में यदि हम नारी के स्वरूप की चर्चा करें तो सबसे पहले तो यही कहना होगा कि नारी माता के रूप में अपनी संतान के रूप में नॉ महीने तक गर्भ में धारण कर उसकी रक्षा में लगी रहती है। फिर असहय वेदना को भी मुस्कराते हुए सहन कर शिशु को जन्म देती है और उसका पालन पोषण करती है। स्वयं भूखा रहना स्विकार कर लेती है,परन्तुअपनी संतान को भूखा नही रहने देती है। स्वयं गीले में सोती है और संतान को सूखे में सुलाती है। वह माता ही है जो अपनी संतान को जगत की पहचान कराती है।यदि माता पहचान नही कराये तो बालक यह जान ही नही पाता है कि कौन उसका पिता,काका,माता दादा दादी भाई काकी आदि है। फिर संतान के पालन पोषण में जिस ममत्व के साथ वह उसकी अगला न भाव से सेवा करती है,वह भी उसकी उदारता का अनुपम उदाहरण है। संतान कैसी भी हो।लूली,लंगड़ी,अंधी सुंदर बदसूरत हो,माता समान भाव से अपना ममत्व लुटाकर उसका पालन पोषण करती है। उसके इस कार्य के लिए इस उदारता के लिए कोई उपमा नही है। ऐसे में उसकी दया,करुणा द्रष्टव्य होती है।यदि माता के रूप में निकृष्ट से निकृष्ट व्यक्ति को जन्म दिया है तो उसने इसी रूप में महान से महान व्यक्ति को भी जन्म दिया।

श्रीराम को जन्म देने वाली भी एक
नारी थी तो रावण को जन्म देने वाली भी एक नारी ही थी।किंतु दोनों के व्यक्तित्व एवं कर्तव्य में जमीन आसमान का अंतर है।इसी प्रकार श्रीकृष्ण और कंस का नाम भी लिया जा सकता है। एक गृहणी के रूप में नारी परिवार में रहकर जो सेवा करती है,वह भी उसकी उदारता का अनुपम उदाहरण है।कहा उसका जन्म हुआ और कहा किसके साथ विवाह हुआ?अनजान परिवार को वह अपना कर अपनी उदारता का परिचय देती है। वह न केवल सबके साथ मुस्कराकर बातचीत करती है,वरन आवश्यकता पड़ने पर सबके काम और सेवा भी अपना कर्तव्य समझकर करती है

नारी का आदर्श पत्नी रूप

नारी को एक पत्नी के रूप में यदि हम देखते है तो हमें उसका एक आदर्श स्वरूप देखने को मिलता है। वह अपने परिवार माता पिता भाई बहन आदि संबंध तोड़कर पति के घर आ जाती है। परिवार का प्रेम स्नेह ममता वह दूसरे परिवार में बिखेर देती है। अपने जन्म वाला परिवार पराया हो जाता है और पति का परिवार उसका अपना हो जाता हो जाता है।

नारी अबला नही,सबला है

नारी में पुरुषों की अपेक्षा गुण अधिक होते है। अपने इन विशिष्ट गुणों के कारण ही नारी ने कई बार असंभव को भी संभव कर दिखाया है। नारी में कोमलता वात्सल्य स्नेहशीलता व्यसन त्याग क्षमा आदि गुण प्रचुरता में पाये जाते है। अपने इन गुणों के कारणों कई बार नारियों ने पुरुषों को युद्ध से विरत किया है। इन गुणों के मूल में उनकी उदारता का गुण प्रमुख रूप से रहा है। नारी का उदार रूप उसे सर्वत्र प्रशंसनीय बनाता है। उसे महान बनाता है। अपने इसी गुण के साथ कही वह अबला दिखाई देती है तो वह इसी गुण के परिणामस्वरूप सबला भी बन जाती है।

एक मुक्तक

आंधी का जोर है तो दीप जलेगा नही।
भूमि कठोर है तो बीज फलेगा नही।क्रांति मचाने वालो कुछ शांति से सोचो-नारी पक्ष कमजोर है तो राष्ट्र चलेगा नही।।

( कांतिलाल मांडोत)

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