
तीन वर्ष बाद शनिश्चरी सर्वपितृ अमावस्या का विशेष संयोग, पितरों की विदाई के अगले ही दिन आदिशक्ति का आगमन
A rare convergence of *Shanishchari Sarvapitri Amavasya* occurs after three years; the arrival of *Adishakti* takes place the very next day after the farewell to the ancestors.
सूरत। सनातन धर्म में इस वर्ष 10 और 11 अक्टूबर का विशेष धार्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व रहेगा। शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होगा, जबकि रविवार, 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ होगा। सर्वपितृ अमावस्या पर शनिवार का यह संयोग तीन वर्ष बाद बन रहा है। इससे पहले 14 अक्टूबर 2023 को ऐसा संयोग बना था।
सूरत के वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ गोविंद मूंदड़ा ने बताया कि अमावस्या का संबंध पितरों से और शनिवार का संबंध कर्मफलदाता शनिदेव से माना जाता है। इसलिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, दीपदान और शनि आराधना का विशेष महत्व है। सर्वपितृ अमावस्या उन पूर्वजों के श्राद्ध के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है अथवा निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया। इस दिन कुश, काले तिल और जल से तर्पण तथा अपराह्न काल में श्राद्ध करने की परंपरा है।
पितृकर्म का अनोखा शास्त्रीय रहस्य: तर्पण में देवताओं, ऋषियों और पितरों को जल अर्पित करने की विधि अलग-अलग होती है। पितरों के लिए अंगूठे और तर्जनी के बीच स्थित पितृतीर्थ से जल अर्पित किया जाता है। पितृ तर्पण में मातृपक्ष सहित दिवंगत पूर्वजों का भी स्मरण किया जाता है। पितृ श्राद्ध के लिए अपराह्न काल तथा शनि आराधना के लिए शनिवार की संध्या का विशेष महत्व माना गया है।
शनिश्चरी अमावस्या पर विशेष दान और उपाय: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काले तिल, काली उड़द, काले वस्त्र, तिल का तेल और लोहे की उपयोगी वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है। वहीं सफेद वस्त्र, चावल, अनाज और भोजन का दान पितरों के निमित्त पुण्यकारी है। पीपल के समीप दीपदान तथा ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का जप भी प्रचलित है। पितृदोष और शनि की साढ़ेसाती अलग-अलग ज्योतिषीय अवधारणाएं हैं, इसलिए इनके उपाय भी व्यक्ति की जन्मकुंडली और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।
रविवार से नवरात्रि, हाथी पर माता का आगमन: आश्विन शुक्ल प्रतिपदा की उदयातिथि के अनुसार 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि प्रारंभ होगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रविवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का आगमन हाथी पर माना जाता है, जो सुख-समृद्धि और मंगल का प्रतीक है। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की जाएगी। श्रद्धालु कलश, नारियल, जौ, लाल चुनरी, पुष्प और दीपक से माता की आराधना करेंगे।
नवरात्रि की प्रमुख तिथियां: 11 अक्टूबर को मां शैलपुत्री, 12 को ब्रह्मचारिणी, 13 को चंद्रघंटा, 14 को कूष्मांडा, 15 को स्कंदमाता, 16 को कात्यायनी और 17 को कालरात्रि की आराधना होगी। 19 अक्टूबर को महाष्टमी एवं महानवमी से संबंधित प्रमुख अनुष्ठान तथा 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। पूजा और कन्या पूजन की तिथियां स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित करें।
पितृपक्ष और नवरात्रि का विशेष संदेश: पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और संस्कारों के सम्मान की प्रेरणा देता है, शनिदेव की आराधना कर्म एवं न्याय का महत्व समझाती है, जबकि नवरात्रि साहस, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इन पर्वों पर जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और आवश्यक सामग्री का दान करना भी पुण्यकारी माना गया है।
“पितरों का सम्मान, कर्मों में ईमानदारी और आदिशक्ति की आराधना ही सुख, शांति और समृद्धि की सच्ची आधारशिला है।”

गोविंद मूंदड़ा
वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ
सूरत



