
रक्षाबंधन पर राखी बांधना रह गया? ऋषि पंचमी देती है एक और विशेष अवसर
15 सितंबर को ‘भाई पंचमी’; माहेश्वरी समाज में रक्षाबंधन की अनूठी परंपरा, जानिए क्यों बांधी जाती है इस दिन राखी और क्या है पौराणिक मान्यता
हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का विशेष धार्मिक महत्व है। मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को मनाई जाने वाली ऋषि पंचमी केवल सप्तऋषियों की आराधना और व्रत-पूजन का पर्व ही नहीं, बल्कि कुछ समाजों में ‘भाई पंचमी’ के रूप में रक्षासूत्र बांधने की विशेष परंपरा से भी जुड़ी है। विशेष रूप से माहेश्वरी समाज में इस परंपरा का खास महत्व है। जो बहन किसी कारणवश श्रावण पूर्णिमा के रक्षाबंधन पर भाई को राखी नहीं बांध पाई हो, वह भी इस दिन भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांध सकती है। कुछ परिवारों में माताएं भी पुत्र को रक्षासूत्र बांधकर उसकी दीर्घायु और मंगल की कामना करती हैं।
आखिर ऋषि पंचमी पर क्यों बांधी जाती है राखी?
वैदिक ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ गोविंद मूंदड़ा के अनुसार माहेश्वरी समाज की प्रचलित उत्पत्ति-कथा में भगवान शिव और माता पार्वती द्वारा 72 उमरावों को श्रापमुक्त कर नवजीवन प्रदान करने का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इसके बाद ऋषियों ने उनका शुद्धिकरण कर उन्हें रक्षासूत्र बांधा और अपना शिष्य स्वीकार किया। यह प्रसंग भाद्रपद शुक्ल पंचमी अर्थात ऋषि पंचमी से जुड़ा माना जाता है। इसी कारण माहेश्वरी समाज में इस दिन रक्षासूत्र बांधने की परंपरा का विशेष महत्व है।
माता संतोषी से जुड़ी एक लोकप्रचलित धार्मिक कथा में भी गणेशजी के पुत्र शुभ और लाभ द्वारा बहन की इच्छा व्यक्त करने तथा संतोषी माता द्वारा भाइयों को राखी बांधने का प्रसंग मिलता है।
दूब से बनते हैं प्रतीकात्मक ‘6 भाई और 1 बहन’
भाई पंचमी की पारंपरिक पूजा में कुछ परिवारों में दूब से प्रतीकात्मक छह भाई और एक बहन की आकृतियां बनाने की परंपरा भी प्रचलित है। इनका पूजन करने के बाद बहन भाई का तिलक कर उसकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधती है। पारिवारिक एवं क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा-विधि में कुछ अंतर हो सकता है।
रक्षा के वचन से आगे—भाई की दीर्घायु की मंगलकामना
सामान्य रक्षाबंधन में भाई-बहन के परस्पर स्नेह, रक्षा और कल्याण का भाव प्रमुख है, वहीं भाई पंचमी में बहन व्रत-पूजन कर भाई के स्वास्थ्य, दीर्घायु और कुशल-मंगल की प्रार्थना करती है। कुछ परंपराओं में पहले सप्तऋषियों को रक्षासूत्र अर्पित करने का विधान भी माना जाता है।
सप्तऋषि और माता अरुंधति का विशेष पूजन
ऋषि पंचमी पर कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ—इन सप्तऋषियों के साथ माता अरुंधति के पूजन की परंपरा है। यह व्रत आत्मशुद्धि, प्रायश्चित तथा जाने-अनजाने हुई धार्मिक त्रुटियों से मुक्ति की कामना से जुड़ा माना जाता है।
प्रचलित व्रत-कथा में उत्तक ब्राह्मण, उनकी पत्नी सुशीला और पुत्री का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार तत्कालीन धार्मिक शुद्धता के नियमों के उल्लंघन से उत्पन्न कर्म-दोषों के प्रायश्चित के लिए पुत्री ने ऋषि पंचमी का व्रत एवं सप्तऋषि पूजन किया और मान्यता के अनुसार उसे दोषों से मुक्ति मिली।
अपामार्ग से शुद्धिकरण और अकृष्ट अन्न की परंपरा
परंपरागत व्रत-विधि में अपामार्ग (चिरचिटा) से दंतधावन/शुद्धिकरण का उल्लेख मिलता है। कई परंपराओं में हल से जोते खेत में उत्पन्न अन्न के स्थान पर अकृष्ट अन्न, जैसे सांवा, मोरधन अथवा पसई के चावल तथा कंद-मूल ग्रहण करने की मान्यता है। व्रत एवं भोजन संबंधी नियम क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग हो सकते हैं।
राखी बांधने का शुभ समय सुबह 10:48 से दोपहर 1:28 तक
मूंदड़ा के अनुसार रक्षासूत्र बांधने का मुख्य शुभ समय प्रातः 10:48 से दोपहर 1:28 बजे तक रहेगा। राहुकाल दोपहर 3:19 से शाम 4:51 बजे तक रहेगा। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस अवधि में रक्षासूत्र बांधने अथवा मुख्य पूजा प्रारंभ करने से बचना उचित माना गया है।
क्या ऋषि पंचमी पर भी भद्रा देखनी जरूरी है?
भद्रा का विशेष विचार मुख्यतः श्रावण पूर्णिमा के रक्षाबंधन पर किया जाता है। ऋषि पंचमी/भाई पंचमी पर रक्षाबंधन जैसा भद्रा-विचार आवश्यक नहीं माना जाता। अतः परंपरा का पालन करने वाले परिवार राहुकाल से बचकर शुभ समय में रक्षासूत्र बांध सकते हैं।
ऋषि पंचमी—ऋषियों की आराधना से भाई-बहन के पवित्र बंधन तक
ऋषि पंचमी जहां सप्तऋषियों के प्रति श्रद्धा, आत्मशुद्धि, प्रायश्चित और परिवार के मंगल का पर्व है, वहीं ‘भाई पंचमी’ की परंपरा भाई-बहन के स्नेह, स्वास्थ्य, दीर्घायु और मंगलकामना को और मजबूत करती है।

गोविंद मूंदड़ा
वैदिक ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ
भाग्यद्रष्टा एस्ट्रो वास्तु प्राइवेट लिमिटेड, सूरत



