
आगणपति बप्पा का शुभ आगमन : 14 सितंबर को घर-घर विराजेंगे विघ्नहर्ता, जानें स्थापना का सबसे शुभ मुहूर्त और श्रीगणेश के स्वरूप में छिपे जीवन के अनमोल रहस्य
गणेश चतुर्थी विशेष | ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ गोविंद मूंदड़ा
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरंभ होने वाला गणेशोत्सव श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का महापर्व है। भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता, बुद्धि एवं सिद्धि के देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य, धार्मिक अनुष्ठान अथवा नई शुरुआत से पहले श्रीगणेश के स्मरण की परंपरा इसी भाव से जुड़ी है कि कार्य निर्विघ्न और सफलतापूर्वक संपन्न हो।
ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ गोविंद मूंदड़ा के अनुसार, इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाई जाएगी। इसी दिन घरों एवं सार्वजनिक पंडालों में गणपति बप्पा की स्थापना के साथ गणेशोत्सव का शुभारंभ होगा।
14 सितंबर को गणपति स्थापना एवं पूजन के शुभ मुहूर्त
गणपति स्थापना में मध्याह्न काल का विशेष महत्व माना गया है। 14 सितंबर को श्रद्धालु निम्न शुभ समय में गणपति की स्थापना एवं पूजा कर सकते हैं—
◆ गणेश पूजा का शुभ मुहूर्त:
सुबह 11:20 बजे से दोपहर 1:48 बजे तक
◆ मध्याह्न गणेश स्थापना का अभिजीत मुहूर्त:
दोपहर 12:09 बजे से 12:58 बजे तक
◆ सायंकालीन पूजा के लिए गोधूलि मुहूर्त:
शाम 6:42 बजे से 7:05 बजे तक
इनमें दोपहर 12:09 से 12:58 बजे तक का अभिजीत मुहूर्त गणपति स्थापना के लिए विशेष शुभ रहेगा। जो श्रद्धालु मध्याह्न में पूजन नहीं कर पाएं, वे सायंकाल गोधूलि मुहूर्त में भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
गणेशोत्सव के दौरान श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और सुविधा के अनुसार डेढ़, 3, 5, 7 अथवा अधिक दिनों तक गणपति की आराधना कर प्रतिमा का विधिपूर्वक विसर्जन करते हैं।
घर में गणपति ला रहे हैं तो इन बातों का रखें ध्यान
गणपति स्थापना से पहले घर और विशेष रूप से पूजा-स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। पूजा के लिए स्वच्छ चौकी पर नया लाल या पीला वस्त्र बिछाकर गणपति की प्रतिमा स्थापित करें। मुख्य द्वार पर तोरण एवं स्वस्तिक से मंगल सज्जा की जा सकती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घर के लिए मिट्टी से बनी, शांत एवं बैठी हुई मुद्रा की गणेश प्रतिमा शुभ मानी जाती है। सामान्य गृहस्थ पूजा में बाईं ओर मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा को सहज पूजन के लिए उपयुक्त माना जाता है। पर्यावरण की दृष्टि से भी प्राकृतिक मिट्टी एवं प्राकृतिक रंगों से बनी प्रतिमा को प्राथमिकता देना बेहतर है।
वास्तु मान्यताओं में उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण को पूजा के लिए श्रेष्ठ माना गया है। यदि वहां स्थापना संभव न हो तो घर के स्वच्छ, शांत एवं पवित्र स्थान का चयन किया जा सकता है।
ऐसे करें सरल गणेश पूजन
पूजन के लिए चौकी, लाल या पीला वस्त्र, कलश, अक्षत, पुष्प, फल, नारियल, सुपारी, दूर्वा, धूप, दीप, कपूर तथा मोदक या लड्डू आदि सामग्री पहले से तैयार रखें।
शुद्ध होकर संकल्प लें और भगवान गणेश का आवाहन करें। प्रतिमा को चौकी पर स्थापित कर तिलक, अक्षत, पुष्प एवं विशेष रूप से दूर्वा अर्पित करें। धूप-दीप प्रज्वलित कर मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और गणेश जी की आरती करें। अंत में परिवार, समाज और सभी के सुख, शांति, स्वास्थ्य एवं समृद्धि की प्रार्थना करें।
पूजन में सरल मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
का श्रद्धापूर्वक जप किया जा सकता है।
केवल पूजा नहीं, गणपति का स्वरूप भी देता है जीवन जीने की सीख
श्रीगणेश का स्वरूप अपने आप में अनेक प्रतीकात्मक संदेश समेटे हुए है। उनका विशाल मस्तक हमें बड़ा और सकारात्मक सोचने की प्रेरणा देता है, जबकि बड़े कान अधिक सुनने और समझने का संदेश देते हैं। छोटे नेत्र लक्ष्य पर एकाग्रता का प्रतीक माने जाते हैं।
उनका विशाल उदर जीवन के सुख-दुःख और अच्छे-बुरे अनुभवों को धैर्य एवं संतुलन के साथ स्वीकार करने की सीख देता है। वहीं एकदंत स्वरूप त्याग, दृढ़ संकल्प और लक्ष्य के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
पौराणिक परंपरा में भगवान गणेश का महाभारत के लेखन से भी विशेष संबंध बताया गया है। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास के कथन को श्रीगणेश ने लिपिबद्ध किया था। इसी कारण उनका स्वरूप बुद्धि, ज्ञान, स्मरण शक्ति और विवेक से भी जोड़ा जाता है।
गणेशोत्सव का वास्तविक संदेश
गोविंद मूंदड़ा के अनुसार, “गणेशोत्सव केवल प्रतिमा स्थापित करने और विसर्जन करने का पर्व नहीं है। श्रीगणेश का स्वरूप हमें सिखाता है कि सोच बड़ी रखें, अधिक सुनें, लक्ष्य पर ध्यान रखें, परिस्थितियों को धैर्य से स्वीकार करें और बाधाओं के सामने रुकने के बजाय बुद्धि व विवेक से आगे बढ़ें। यही गणपति आराधना का व्यावहारिक संदेश है।”
उन्होंने कहा कि गणेशोत्सव को भक्ति के साथ-साथ परिवार में संस्कार, समाज में एकता, जरूरतमंदों की सहायता और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना चाहिए। पूजा में दिखावे से अधिक श्रद्धा, स्वच्छता और सात्विकता को महत्व देना ही इस महापर्व की सार्थकता है।
गणपति बप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया!

गोविंद मूंदड़ा
ज्योतिष एवं वास्तु हस्तरेखा विशेषज्ञ
भाग्यद्रष्टा एस्ट्रो वास्तु प्राइवेट लिमिटेड



