भारतीय संस्कृति में माँ का स्थान

कांतिलाल मांडोत
भारतीय संस्कृति में माँ का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण माना गया है। माता अपनी संतान के लिए अनेकों कष्ट सहकर उनका लालन पालन करती है। इस धरती को भी माँ की उपमा देते हुए कहा गया है कि धरती मेरी माँ है और मैं उसका पुत्र हूँ। अपनी संतान के लिए जितने कष्ट माँ सहन करती है उतने कष्ट और कोई सहन नही करता है। संतान का भी कर्तव्य है कि अपने माँ की प्रसन्नता के लिए अपने कष्टों की परवाह नही करे। माँ जिन तन्मयता के साथ अपनी संतान को सुखी बनाने का प्रयत्न करती है उसी प्रकार संतान को भी चाहिए कि उसी तन्मयता के साथ माँ की सेवा करे। उसके विचारों का सम्मान करें। माँ का आशीर्वाद बालक के जीवन को तेज गति प्रदान करने वाला होता है। माता के रूप में यदि हम नारी के स्वरूप की चर्चा करें तो सबसे पहले तो यही कहना होगा कि नारी माता के रूप में अपनी संतान को नौ माह तक गर्भ में धारण कर उसकी रक्षा में लगी रहती है। फिर असहाय वेदना को भी मुस्कराते हुए सहन कर शिशु को जन्म देती है और उसका पालन पोषण करती है।

स्वयं भूखा रहना स्वीकार कर लेती है,किन्तु अपनी संतान को भूखा नही रहने देती है। स्वयं गीले में सोती है और संतान को सूखे में सुलाती है। यदि माता पहचान नही कराए तो बालक यह जान नही पाये कि कौन किसका पिता,काका,माता,दादा,भाई ,काकी आदि है। संतान के पालन पोषण में जिस ममत्व के साथ वह उसकी अगलान भाव से सेवा करती है। वह भो उसकी उदारता के अनुरूप उदाहरण है।संतान कैसी भी हो,लंगड़ी हो,सुंदर हो,बदसूरत हो, माता समान भाव से अपना ममत्व लूटाकर उसका पालन पोषण करती है। उसके इस कार्य के लिए इस उदारता के लिए कोई उपमा नही है। ऐसे में उसकी दया करुणा दृष्टव्य होती है। यदि माता के रूप में नारी ने निकृष्ट से निकृष्ट व्यक्ति को जन्म दिया है तो उसने उसी रूप में महान से महान व्यक्ति को भी जन्म दिया है। यहां ऐसे महान अथवा निकृष्ट व्यक्तियों की सूची प्रस्तुत करने की आवश्यकता मैं महसूस नही करता हूं।

फिर भी बता दे कि श्रीराम को जन्म देने वाली भी एक नारी ही थी और रावण को जन्म देने वाली भी एक नारी ही थी किन्तु दोनों के व्यक्तित्व एवं कर्तव्य में जमीन आसमान का अंतर है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण और कंस का नाम भी लिया जा सकता है।नारी को एक पत्नी के रूप में यदि हम देखते है तो हमे उसका एक आदर्श स्वरूप देखने को मिलता है। वह अपने परिवार, माता पिता,भाई बहन आदि से संबंध तोड़कर अपने पति के घर जाती है। परिवार का प्रेम, स्नेह, ममता वह दूसरे परिवार में बिखेर देती है। अपने जन्म वाला परिवार पराया हो जाता है और पति का परिवार उसका अपना हो जाता है। वह मन, वचन, कर्म से पति के घर को अपना घर मान लेती है और उसके हर सुख दुख में सहभागी बन जाती है।वह अपने पति की सेवा में सर्वस्व न्योछावर कर देती है,वही अपने सास ससुर की प्राणपण से सेवा कर अपनी उदारता का उत्कृष्ट परिचय देती है।

इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जिनसे ज्ञात होता है कि पत्नी किस प्रकार अपने पति के साथ कंधे से कंधे मिलाकर उसका साथ देती है और किस प्रकार वह अपने पति को विचलित होने से बचाती है।फिर इसमे भले ही कितने ही कष्ट क्यों न उठाने पड़े। पत्नी के रूप में नारी अपने पति को धर्मानुरागी बनाने का भी सुकाम करती है। उदाहरण के लिए महासती चेलना और सती सुभद्रा का नाम लिया जा सकता है। महारानी चेतना ने अपने पति महाराजा श्रेणिक की वीतराग वाणी पर स्थिर कर जहाँ आदर्श पत्नी का कर्तव्य निभाया था,यही सती सुभद्रा ने भी अपने पति और पूरे परिवार को श्रमण धर्म का उपासक बनाया।

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