
जो चले गए उन्हें श्रद्धा, जो साथ हैं उनकी कद्र… यही है पितृ पक्ष का असली संदेश
पितृ पक्ष का प्रारंभ और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या
सूरत। पितृ पक्ष केवल दिवंगत पूर्वजों के लिए किया जाने वाला कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और परिवार को संस्कारों से जोड़ने का विशेष समय है। जिन पूर्वजों के संघर्ष, त्याग और संस्कारों की नींव पर आज हमारा परिवार खड़ा है, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना ही श्राद्ध का मूल भाव है।
पितृ पक्ष 2026 : सभी श्राद्ध तिथियां
26 सितंबर
पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर
प्रतिपदा मुख्य पितृ पक्ष प्रारंभ
28 सितंबर
द्वितीया
29 सितंबर
तृतीया एवं महाभरणी
30 सितंबर
चतुर्थी एवं पंचमी
1 अक्टूबर
षष्ठी
2 अक्टूबर
सप्तमी
3 अक्टूबर
अष्टमी
4 अक्टूबर
नवमी / मातृ नवमी
5 अक्टूबर
दशमी
6 अक्टूबर
एकादशी
7 अक्टूबर
द्वादशी
8 अक्टूबर
त्रयोदशी
9 अक्टूबर
चतुर्दशी
10 अक्टूबर
सर्वपितृ अमावस्या समापन
श्राद्ध का अर्थ ही है श्रद्धा
धर्मग्रंथों एवं पुराण-परंपरा में पितृकर्म, तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध का उल्लेख मिलता है। महाभारत में भी पितरों से जुड़े प्रसंग हैं और कर्ण की प्रसिद्ध कथा पितरों के लिए अन्न अर्पण के महत्व को समझाती है। प्राचीन परंपरा में महर्षि निमि एवं अत्रि ऋषि से जुड़ा श्राद्ध-विधान का प्रसंग भी मिलता है।
सरल शब्दों में, जिनसे हमें जीवन, परिवार, पहचान और संस्कार मिले, उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करना ही श्राद्ध का मूल भाव है।
श्राद्ध का सही मुहूर्त क्या है?
सामान्य पूजा में सुबह का विशेष महत्व होता है, लेकिन श्राद्ध में अपराह्न काल को विशेष माना गया है। इसे आसान भाषा में तीन भागों में समझें कुतप काल, उसके बाद रौहिण काल और फिर अपराह्न काल।
सामान्यतः यह समय दोपहर के आसपास से दोपहर बाद तक रहता है। मोटे तौर पर लगभग 11 बजे से 4 बजे के आसपास समझ सकते हैं, लेकिन इसे पूरे भारत का निश्चित समय न मानें।
सूर्योदय-सूर्यास्त के कारण हर शहर का मुहूर्त अलग होता है, इसलिए जिस शहर में श्राद्ध हो, वहीं के पंचांग का कुतप एवं अपराह्न काल मानें।
सरल विधि—दिखावा नहीं, श्रद्धा जरूरी
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें, पूर्वजों का स्मरण करें और अपनी कुल-परंपरा के अनुसार कुश, काले तिल और जल से तर्पण करें। जहाँ परंपरा हो वहाँ विधिपूर्वक पिंडदान एवं श्राद्ध करें। भोजन का भाग जीवों के लिए निकालें और सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद को भोजन या अन्नदान करें।
अलग-अलग परिवार, समाज और क्षेत्र की विधि में अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी कुल-परंपरा को प्राथमिकता देना उचित है।
कौआ, गाय और कुत्ते को भोजन क्यों?
श्राद्ध केवल कौए को भोजन कराने तक सीमित नहीं है। परंपरा में गाय, कुत्ते, कौए एवं अन्य जीवों के लिए भी भोजन का अंश निकालने का भाव मिलता है। कौए को पितरों से जुड़ा प्रतीक माना गया है, गाय का सनातन परंपरा में विशेष स्थान है और अन्य जीवों को भोजन देना जीव-दया एवं सेवा का प्रतीक है।
इसका सुंदर संदेश है।पूर्वजों को याद करते समय किसी भूखे जीव का पेट भी भर जाए। केवल कौए ने भोजन खाया या नहीं, इसे पितरों के प्रसन्न या नाराज होने का निश्चित संकेत मानना उचित नहीं है।
ज्योतिष में पितृ पक्ष और पितृ दोष
वैदिक ज्योतिष में सूर्य को पिता और वंश, चंद्रमा को मन एवं मातृभाव तथा नवम भाव को पिता, गुरु, धर्म एवं पूर्वजों की परंपरा से जोड़ा जाता है। कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में सूर्य, नवम भाव, नवमेश तथा राहु-केतु आदि की विशेष स्थितियों को पितृ दोष के विचार में देखा जाता है।
लेकिन हर बीमारी, विवाह में देरी, संतान की परेशानी या व्यापार में नुकसान को पितृ दोष कहना सही नहीं है। इसके लिए पूरी जन्मकुंडली, ग्रह, भाव और दशाओं का अध्ययन जरूरी है। इसी तरह श्राद्ध करने मात्र से सभी नौ ग्रह निश्चित रूप से शुभ हो जाएंगे, ऐसा दावा भी उचित नहीं है।
दो बातें जो हर व्यक्ति को जाननी चाहिए
6 सितंबर का पूर्णिमा श्राद्ध मुख्य पितृ पक्ष प्रारंभ होने से पहले है। मुख्य पितृ पक्ष 27 सितंबर की प्रतिपदा से शुरू होगा।
श्राद्ध सामान्यतः अंग्रेजी तारीख से नहीं, बल्कि जिस चंद्र तिथि पर निधन हुआ था, पितृ पक्ष की उसी तिथि के अनुसार किया जाता है। जिनकी मृत्यु-तिथि ज्ञात न हो, जिनका श्राद्ध छूट गया हो अथवा ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वजों का स्मरण करना हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व है।
पितृ पक्ष की सबसे बड़ी सीख जीवित रिश्तों की भी समय रहते कद्र करे
पितृ पक्ष केवल यह नहीं सिखाता कि जो चले गए उनका श्राद्ध करें। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि जो आज हमारे साथ हैं, उनकी समय रहते कद्र करें।
परिवार का कोई भी रिश्ता हर रिश्ते को समय, प्रेम, सम्मान और समझ चाहिए। छोटी नाराजगी और अहंकार को इतना बड़ा न बनने दें कि किसी अपने के चले जाने के बाद केवल यही रह जाए “काश! एक बार और बात कर ली होती…”
“जो चले गए उन्हें श्रद्धा से याद करें, जो साथ हैं उनकी दिल से कद्र करें और पूर्वजों से मिले अच्छे संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ यही पितृ पक्ष की सबसे सुंदर श्रद्धांजलि है।”

गोविंद मुंदड़ा
वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ
संस्थापक — भाग्यद्रष्टा एस्ट्रो वास्तु प्रा. लि.



