धर्म- समाज

गणपति स्वयं पंचमहाभूतों के स्वरूप… फिर विसर्जन में प्रकृति का अपमान क्यों?

विसर्जन में कुछ भी फेंकने से पहले एक बार जरूर सोचें बप्पा की विदाई के बाद आस्था के निशान रहें, गंदगी के नहीं” गोविंद मुंदड़ा

सूरत। कई दिनों तक जिन गणपति बप्पा को श्रद्धा से घर और पंडाल में विराजमान कर फूल, प्रसाद और आरती अर्पित की जाती है, उनकी विदाई भी उतनी ही श्रद्धा, संस्कार और जिम्मेदारी से होनी चाहिए। गणपति विसर्जन केवल परंपरा नहीं, हमारी आस्था के साथ हमारे कर्म और विवेक की भी परीक्षा है।

वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ गोविंद मुंदड़ा ने समाज से अपील करते हुए कहा, “विसर्जन के समय नदी, तालाब, सड़क या किनारे पर कुछ भी फेंकने से पहले केवल एक क्षण रुककर सोचिए जिस बप्पा को इतने दिनों तक भगवान मानकर पूजा, क्या उनकी विदाई के नाम पर उनकी ही धरती और जल को गंदा करना उचित है? गंदगी करने के बाद सफाई से बेहतर है कि हम गंदगी होने ही न दें।”

गणपति स्वयं पंचमहाभूतों के स्वरूप

गणपति अथर्वशीर्ष में कहा गया है

“त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।”

अर्थात आप ही पृथ्वी हैं, आप ही जल हैं, आप ही अग्नि हैं, आप ही वायु हैं और आप ही आकाश हैं। अथर्वशीर्ष में गणपति को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इंद्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चंद्र स्वरूप भी कहा गया है। हमारी धार्मिक परंपरा में गणपति प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माने जाते हैं तथा शुभ कार्यों की शुरुआत श्रीगणेश के स्मरण और पूजन से होती है।

ऐसे में सवाल स्वाभाविक है

जब गणपति स्वयं पृथ्वी और जल के स्वरूप हैं, तो प्रतिमा में उनकी पूजा करके विसर्जन के समय उन्हीं की पृथ्वी और जल को प्रदूषित करना कैसी भक्ति?

पूजा में नदी मां… तो विसर्जन में कूड़ेदान क्यों?

विसर्जन के दौरान और बाद में नदी-तालाबों तथा किनारों पर प्रतिमाओं के अवशेष, फूल-मालाएं, प्लास्टिक, थर्मोकोल, कृत्रिम सजावट और अन्य कचरा छोड़ना हमारी आस्था के अनुरूप नहीं है। पीओपी, हानिकारक कृत्रिम रंग, प्लास्टिक और आसानी से नष्ट न होने वाली सामग्री जल की गुणवत्ता, पर्यावरण और जलीय जीवन को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमा, सुरक्षित प्राकृतिक रंग, पर्यावरण-अनुकूल सजावट तथा प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन व्यवस्था को प्राथमिकता दें। पूजा-सामग्री और कचरे को नदी-तालाब में न डालें।

पूजा हमारी, उत्सव हमारा और बप्पा हमारे हैं तो स्वच्छता और जिम्मेदारी भी हमारी ही होनी चाहिए।

10 से 30 फीट की प्रतिमा… क्या भक्ति भी आकार से तय होगी?

आज कई स्थानों पर 10 से 30 फीट तक की विशाल गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। मुंदड़ा के अनुसार, “मुझे उपलब्ध प्रमाणित शास्त्रीय आधार में ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि इतनी विशाल प्रतिमा स्थापित करने से भगवान अधिक प्रसन्न होते हैं या पूजा अधिक फलदायी हो जाती है। छोटी प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमा में भी वही गणपति हैं और विशाल प्रतिमा में भी वही।”

भगवान स्वयं अनंत हैं। उन्हें बड़ा दिखाने की जरूरत नहीं बड़ा करना है तो अपनी सोच, श्रद्धा, विवेक, संस्कार और चरित्र को कीजिए। प्रतिमा की ऊंचाई से भक्ति की ऊंचाई तय नहीं होती।

मंगल की शांति करें और भूमि को गंदा करें यह कैसा विरोधाभास?

ज्योतिषीय दृष्टि से मंगल भूमि का कारक, चंद्रमा जल और मन से संबंधित, शनि कर्म और कर्मफल से संबंधित माने जाते हैं, जबकि राहु को विषाक्तता, धुआं और कृत्रिमता जैसी प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है।

मुंदड़ा ने कहा, “एक तरफ मंगल की शांति के उपाय करें और भूमि को दूषित करें, चंद्रमा की शांति करवाएं और जल को प्रदूषित करें—तो हमें अपने कर्मों पर भी विचार करना चाहिए। ग्रहों से शुभता चाहते हैं तो उनके कारक प्राकृतिक तत्वों का सम्मान भी हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। शनि कर्मप्रधान हैं—इसलिए पूजा के साथ हमारे कर्मों का महत्व भी समझना होगा।”

और जब गणपति स्वयं प्रथम पूज्य हैं तथा अथर्वशीर्ष उन्हें सूर्य-चंद्र सहित अनेक दिव्य शक्तियों के स्वरूप में प्रस्तुत करता है, तो गणपति की आराधना केवल प्रतिमा की पूजा तक सीमित न रहकर उनके प्रकृति स्वरूप के सम्मान में भी दिखाई देनी चाहिए।

बप्पा बुद्धि के देवता हैं… तो भक्ति में बुद्धि भी दिखाई दे

मुंदड़ा ने अपील की, “विसर्जन के समय कुछ भी फेंकने से पहले एक बार जरूर सोचें। प्लास्टिक, थर्मोकोल, सजावट, पूजा-सामग्री और कचरा नदी-तालाब में न डालें। निर्धारित स्थान पर ही विसर्जन करें। बप्पा की विदाई ऐसी हो कि अगले दिन हमारी आस्था पर सवाल नहीं, गर्व हो।”

और जब नम आंखों से कहें

“गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ…”

तो साथ में यह संकल्प भी लें

“बप्पा, अगले बरस आप जरूर जल्दी आना… हम आपकी बनाई धरती और जल को गंदा नहीं करेंगे।”

बप्पा को विदा करें… उनकी बनाई प्रकृति को नहीं।

विसर्जन आस्था है दिखावा, गंदगी और प्रकृति का विनाश नहीं।

सच्ची भक्ति केवल पूजा में नहीं, पूजा के बाद हमारे कर्मों में भी दिखाई देती है।

गोविंद मुंदड़ा
वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ

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